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बोधघाट परियोजना का विरोध:दंतेवाड़ा में 5 जिलों के 56 गांव के आदिवासी और ग्रामीण जुटे; कहा- प्राण देंगे, लेकिन बांध के लिए जमीन नहीं

08/02/2021 posted by Priyanka (Media Desk) Chhattisgarh, Tribal Area News and Welfare    

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर बोधघाट बांध परियोजना (पावर प्रोजेक्ट) का विरोध शुरू हो गया है। दंतेवाड़ा की सीमा से लगे गांव में रविवार से ही 5 जिलों के 56 गांवों के आदिवासी और ग्रामीण एकजुट हो गए हैं। आदिवासियों का कहना है कि हम प्राण दे देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे। यह बांध हमारे खेत और घर को बर्बाद कर देगा। जगदलपुर से करीब 100 किमी दूर इंद्रावती नदी पर बांध बनाया जाना है। हालांकि 8 साल पहले निर्माण कार्य बंद करना पड़ा था।

मां दंतेश्वरी जनजाति हित रक्षा समिति की ओर से ग्रामीण बीजापुर के हितलकूडूम गांव में चर्चा कर रहे हैं। तीन दिन चलने वाली इस परिचर्चा के दौरान जो निर्णय होगा, उसके अनुसार आगे की रणनीति तय की जाएगी। इसमें दंतेवाड़ा सहित बस्तर, कोंडागांव, नारायणपुर और बीजापुर जिले के हजारों ग्रामीण शामिल हो रहे हैं। पहले दिन ही करीब 1 हजार ग्रामीण परियोजना का विरोध करने परिचर्चा में शामिल हुए हैं।

प्रभावित गांवों में बोर नहीं, बारिश के पानी से खेती, ऐसी जमीन नहीं मिलेगी

समिति के अध्यक्ष सुखमन कश्यप बताते हैं कि बांध के विरोध में हम राज्यपाल, मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष सब से मिले थे। दंतेवाड़ा में आकर CM ने कहा है, बोधघाट बांध किसी के विरोध में नहीं रुकेगा। हम मुआवजा नहीं देंगे, जमीन देंगे।

सुखमन कहते हैं, पर इससे 56 गांवों के खेती को नुकसान होगा। वैसी जमीन नहीं मिलेगी। इसलिए हम जाना नहीं चाहते। यहां बोर नहीं है, बारिश से ही खेती होती है। 12 साल में होने वाला देवी-देवता पूजन भी करेंगे। परिचर्चा के दौरान ही आदिवासी समाज 12 साल में होने वाला देवी-देवता पूजन भी करेंगे। मान्यता है कि इस दिन नए राजा का जन्म होता है।

50 लाख से ज्यादा पेड़ खत्म होंगे, 10 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन और निजी भूमि प्रभावित होगी

पूर्व में हुए सर्वे के अनुसार, प्रोजेक्ट से 5407 हेक्टेयर वन भूमि, 5010 हेक्टेयर निजी भूमि और 3068 हेक्टेयर राजस्व भूमि मिलाकर 13783 हेक्टेयर भूमि प्रभावित हो रही है। 56 गांव पूरी तरह प्रभावित होंगे। इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी दिक्कत यह भी है कि डूबान क्षेत्र और बांध को मिलाकर 50 लाख से ज्यादा पेड़ खत्म होंगे। इनमें साल, सागौन, साजा, बीजा, शीशम सहित दुर्लभ जड़ी-बूटियां शामिल हैं। हालांकि इसकी भरपाई के लिए अलग से प्रोजेक्ट बनाकर काम करने की भी बात कही गई है।

इस्तेमाल होगा इंद्रावती का पानी, 500 मेगावॉट होगा बिजली का उत्पादन

इंद्रावती बस्तर की सबसे प्रमुख नदी है। यह ओडिशा में करीब 174 किमी बहने के बाद छत्तीसगढ़ पहुंचती है। बस्तर में यह 234 किमी बहती है। पहले हुए सर्वे के मुताबिक, इंद्रावती नदी सालाना 290 TMC पानी गोदावरी नदी में छोड़ती है। इस पानी का कोई उपयोग न तो कृषि के लिए हो रहा है और न बिजली उत्पादन के लिए। पानी को रोकने के लिए बांध सिर्फ आधा दर्जन जगहों पर छोटे-छोटे एनीकट हैं। इस प्रोजेक्ट से इंद्रावती नदी के व्यर्थ बह रहे पानी का उपयोग होगा और 500 मेगावॉट बिजली का उत्पादन भी।

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Priyanka (Media Desk)
Priyanka (Media Desk)प्रियंका (Media Desk)
"जय जोहार" आशा करती हूँ हमारा प्रयास "गोंडवाना एक्सप्रेस" आदिवासी समाज के विकास और विश्व प्रचार-प्रसार में क्रांति लाएगा, इंटरनेट के माध्यम से अमेरिका, यूरोप आदि देशो के लोग और हमारे भारत की नवनीतम खबरे, हमारे खान-पान, लोक नृत्य-गीत, कला और संस्कृति आदि के बारे में जानेगे और भारत की विभन्न जगहों के साथ साथ आदिवासी अंचलो का भी प्रवास करने अवश्य आएंगे।