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अलविदा भारत रत्न… जब पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी के मना करने के बाद भी प्रणव मुखर्जी चुनाव लड़े थे

इंदिरा गांधी जी ने मुझे कड़ी हिदायत दी थी कि मैं 1980 में चुनाव ना लडूँ लेकिन मैंने जोरदार हठ करते हुए बोलपुर से चुनाव लड़ा। जब परिणाम आया तो मैं 68 हजार से अधिक मतों से पराजित हुआ। मेरा मन कर रहा था कि मैं जोर-जोर रोऊँ इसलिए मैंने अपने आपको एक कमरे में जैसे ही बंद किया वैसे ही पत्नी गीता ने दरवाजा खटखटाते हुए बोला कि इंदिरा जी ने दिल्ली बुलाया है।

अगले इंदिरा जी के पास पहुँचा तो वो ज़ुकाम से पीड़ित थी और दोनों पैर गर्म पानी के टब में रख कर बैठी थीं। मुझे देखते ही उन्होंने ऐसी डाँट लगायी जिसे सुनकर मुझे ऐसा लगा कि मैंने राजनीति में आ कर बहुत बड़ी गलती कर दी है।

अगले दिन मीडिया में मंत्रिमंडल गठन की बातें होने लगीं और बंगाल से ही जीतने वाले बरकत साहब के मंत्री बनने की चर्चा शुरू हो गयी। बरकत के घर के सामने कांग्रेस नेता भी जुटने लगे। मेरा घर सूना होता जा रहा था।

14 जनवरी की सुबह शपथ ग्रहण का दिन था। अधिकतर अखबार मेरे अलावा सारे कयास लगा चुके थे। मेरे पास कोई भी सूचना नही थी। तभी आर.के. धवन का मेरे पास फोन आया और उन्होंने मुझे अशोक हॉल पहुँचने को बोला। वहाँ पहुँचा तो देखा शपथ लेने वाले मंत्रियों में मेरे लिए कोई कुर्सी नही थी। मैंने इंदिरा जी की तरफ देखा। इंदिरा जी ने मुझे देखते ही तत्काल एक हाथ से लिखा लेटर राष्ट्रपति के सचिव को भेजा और मुझे आर वेंकटरमन और पी. वी. नरसिम्हाराव के बीच बैठने को बोला।

और फिर मैंने भारतीय गणराज्य की एक चुनी हुई सरकार में मंत्री पद की शपथ ली।

इंदिरा जी कहती थीं कि ‘प्रणब से कोई चाहे जो कहे, मगर उनके मुंह से धुएं के अलावा कुछ नहीं निकलेगा।’
– आत्मकथा : प्रणब मुखर्जी

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