क्या है सबरीमाला विवाद? पढ़िए भगवान अयप्पा के बारे में वो सब जो आप जानना चाहते है

सबरीमाला मंदिर महिला प्रवेश को लेकर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने महिला प्रवेश पर प्रतिबंध को हटाए जाने का फैसला सुनाया तब से कई हिंदूवादी संगठन इसका विरोध कर रहे हैं आइए समझते हैं यह विवाद क्या है? क्यों इसका विरोध हो रहा है?

भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है विश्‍व प्रसिद्ध सबरीमाला का मंदिर। यहां हर दिन लाखों लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है। करीब 800 साल पुराने इस मंदिर में ये मान्यता पिछले काफी समय से चल रही थी कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश ना करने दिया जाए।

कौन है भगवान अयप्पा

भगवान अयप्पा विष्णु और शिव के पुत्र हैं. यह किस्सा उनके अंदर की शक्तियों के मिलन को दिखाता है न कि दोनों के शारीरिक मिलन को। इनसे सस्तव नामक पुत्र का जन्म का हुआ जिन्हें दक्षिण भारत में अयप्पा कहा गया। शिव और विष्णु से उत्पन होने के कारण उनको ‘हरिहरपुत्र’ कहा जाता है। इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है। इनके दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला। इसे दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है।




भारतीय राज्य केरल में सबरीमाला में अयप्पा स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां विश्‍वभर से लोग शिव के इस पुत्र के मंदिर में दर्शन करने के लिए आते हैं। इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह-रहकर यहां एक ज्योति दिखती है। इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं।

बताया जाता है कि जब-जब ये रोशनी दिखती है इसके साथ शोर भी सुनाई देता है। भक्त मानते हैं कि ये देव ज्योति है और भगवान इसे जलाते हैं। मंदिर प्रबंधन के पुजारियों के मुताबिक मकर माह के पहले दिन आकाश में दिखने वाले एक खास तारा मकर ज्योति है। कहते हैं कि अयप्पा ने शैव और वैष्णवों के बीच एकता कायम की। उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया था और सबरीमाल में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

यह मंदिर पश्चिमी घाटी में पहाड़ियों की श्रृंखला सह्याद्रि के बीच में स्थित है। घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों को पार करके यहां पहुंचना होता है जो लोग यहां तीर्थयात्रा के उद्देश्य से आते हैं उन्हें इकतालीस दिनों का कठिन वृहताम का पालन करना होता है। तीर्थयात्रा में श्रद्धालुओं को ऑक्सीजन से लेकर प्रसाद के प्रीपेड कूपन तक उपलब्ध कराए जाते हैं। दरअसल, मंदिर नौ सौ चौदह मीटर की ऊंचाई पर है और केवल पैदल ही वहां पहुंचा जा सकता है।

एक अन्य कथा के अनुसार पंडालम के राजा राजशेखर ने अय्यप्पा को पुत्र के रूप में गोद लिया। लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये सब अच्छा नहीं लगा और वो महल छोड़कर चले गए। आज भी यह प्रथा है कि हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर पंडालम राजमहल से अय्यप्पा के आभूषणों को संदूकों में रखकर एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। जो नब्बे किलोमीटर की यात्रा तय करके तीन दिन में सबरीमाला पहुंचती है। इस मंदिर में सभी जाति के लोग जा सकते हैं, लेकिन 10-50 साल की उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है।

18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है

इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं। पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा जाता है। इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा जाता है। अगली तीन सीढ़ियों को मानवीय गुण और आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा यहां आने वाले श्रद्धालु सिर पर पोटली रखकर पहुंचते हैं। वह पोटली भगवान को चढ़ाई जानी वाली चीजें, जिन्हें प्रसाद के तौर पर पुजारी घर ले जाने को देते हैं) से भरी होती है। यहां मान्यता है कि तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर और सिर पर नैवेद्य रखकर जो भी व्यक्ति आता है उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती है।।।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में 10 वर्ष से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा लिया। इस मंदिर में 1500 वर्षों से महिलाओं का प्रवेश वर्जित था और पिछले कई सालों से यह मामला कोर्ट में लटका पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए और अब उन्हें मंदिर में जाने से नहीं रोका जाएगा।

केरल का सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा का मंदिर है। माना जाता है कि भगवान अयप्पा अविवाहित थे और महिलाओं से दूर रहते थे। जिस कारण इस मंदिर में 1500 सालों से महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित था। लोगों का मानना है कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है और इस दौरान उन्हें अपवित्र माना जाता है, जिसके कारण वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकती।

मानते हैं समानता का प्रतीक

सबरीमाला भारत के ऐसे कुछ मंदिरों में से है जिसमें सभी जातियों के स्त्री (10-50 उम्र से अलग) और पुरुष दर्शन कर सकते हैं। यहां आने वाले सभी लोग काले कपड़े पहनते हैं। यह रंग दुनिया की सारी खुशियों के त्याग को दिखाता है। इसके अलावा इसका मतलब यह भी होता है कि किसी भी जाति के होने के बाद भी अयप्पा के सामने सभी बराबर हैं। साथ ही यहां पर उन भक्तों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है, जो मंदिर में ज्यादा बार आए होते हैं न कि उनको जिनकी जाति को समाज तथाकथित रूप से ऊंचा मानता हो।




इसके अलावा सबरीमाला आने वाले भक्तों को यहां आने से 40 दिन पहले से बिल्कुल आस्तिक और पवित्र जीवन जीना होता है। यहां दर्शन के दौरान भक्त ग्रुप बनाकर प्रार्थना करते हैं। एक ‘दलित’ भी इस प्रार्थना को करवा सकता है और अगर उस ग्रुप में कोई ‘ब्राह्मण’ है तो वह भी उसके पैर छूता है।

पीरियड्स से नहीं है संबंध

देवैया लिखते हैं कि ऐतिहासिक अयप्पा के अलावा भी एक पुराणों में वर्णित पुरुष को भी उनके साथ जोड़ा जाता है। जो कहता है कि अयप्पा विष्णु और शिव के पुत्र हैं। यह किस्सा उनके अंदर की शक्तियों के मिलन को दिखाता है न कि दोनों के शारीरिक मिलन को इसके अनुसार देवता अयप्पा में दोनों ही देवताओं का अंश है। जिसकी वजह से भक्तों के बीच उनका महत्व और बढ़ जाता है। और इसका पीरियड्स से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

मंदिर की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार सबरीमाला मंदिर में श्रद्धालुओं के प्रवेश के नियम बहुत कठिन हैं। इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए श्रद्धालु को कम से कम 41 दिनों का उपवास रखना बेहद जरूरी होता है। लेकिन महिलाओं का मासिक धर्म चक्र 28 दिन का होता है जिसके कारण वे 41 दिनों का उपवास नहीं रख सकती हैं जिसके कारण वे अपवित्र हो जाती हैं और मंदिर में आने के योग्य नहीं होती हैं।
सबरीमाला मंदिर में आने वाले तीर्थयात्री काले या नीले रंग के कपड़े पहनते हैं और जब तक उनकी यात्रा पूरी न हो जाए तब तक वे यह कपड़ा उतार नहीं सकते हैं। इसके अलावा यात्रा पूरी होने तक उन्हें अपने माथे पर चंदन का लेप लगाए रखना जरूरी होता है।

उच्चतम न्यायालय और केरल सरकार के फैसले के बाद भी सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर अभी भी बवाल जारी है। मंगलवार को केरल के विभिन्न हिस्सों में हुए प्रदर्शन में महिलाएं भी थीं। प्रदर्शनों की शुरूआत करने वालों में ‘अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद’ जैसे संगठन शामिल थे। इनकी मांग थी कि, मंदिर में महिलाओं का जाने पर पुन: रोक लगाई जाए। इस दौरान एक महिला ने पेट्रोल छिड़क कर आत्मदाह करने का प्रयास किया लेकिन पुलिस ने उसे बचा लिया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि अदालत भगवान अयप्पा से बड़ी नहीं है। उन्होंने मांग की कि राज्य और केंद्र सरकार पुराने प्रतिबंध को बनाए रखने के लिए उपयुक्त कानून लागू करे।

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर अब केरल सरकार ने कहा कि वह मंदिर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन नहीं लगाएगी और ना ही महिलाओं को अब मंदिर में जाने से रोकेगी।केरल सरकार के इस ऐलान के बाद से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को जाने का रास्ता खुल गया है। अब महिलाएं बिना किसी रोक-टोक के मंदिर में जा सकेंगी।

हालांकि, इसके बाद भी कुछ संगठन ऐसे थे जो न्यायालय के आदेश का विरोध कर रहे थे और सरकार से मांग थी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल किया जाए। केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन इन सभी मांगो को नकारते हुए कोर्ट के फैसले का सम्मान किया है। पी विजयन ने कहा कि महिला श्रद्धालुओं को मंदिर में दर्शन करने से रोकने का अधिकार किसी के पास नहीं है।मुख्यमंत्री पी विजयन ने बताया कि इस मामले में मंदिर का प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्वाम बोर्ड (TDB) ने भी रिव्यू के संबंध में कोई फैसला नहीं किया है। इस मामले के हर पहलू को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया है। ऐसे में लोगों को यह फैसला मानना होगा। सरकार का काम कोर्ट के आदेश को लागू करना है।आदेश के अनुसार महिलाओं के दर्शन के लिए जरूरी व्यवस्था करेेंगे। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि महिला श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए सभी जरूरी व्यवस्था की जाए।



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