#culture तीजा के तीज सुहागन महिलाओं का त्यौहार, जानिए पौराणिक कथा और महत्व

सुहागिनें जहां अपने पति की लंबी आयु के लिए तीज का व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित लड़कियां अच्छा वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं। यूं तो हरतालिका तीज देश के कई राज्यों में मनाई जाती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस त्योहार का उत्साह दोगुना हो जाता है। मानसून के मौसम का स्वागत करने के लिए छत्तीसगढ़ और उत्तरी भारत में तीज त्योहार (‘छत्तीसगढ़ी  में तीजा’) मनाया जाता है। पति की लंबी उम्र की कामना और परिवार की खुशहाली के लिए सभी विवाहित महिलाओं में निर्जला उपवास रखती है (वे पूरे दिन पानी नहीं पीते हैं) और शाम को तीज माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा के बाद, वे पानी और भोजन लेती है।

तीज के एक दिन पहले सभी महिलाये एक दूसरे के घर जाकर कड़वा भोजन (छत्तीसगढ़ी में ‘करू भात’) का सेवन करती है। करेले की सब्जी एवं अन्य व्यंजन बनाये जाते है।  यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया (भादो की शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन) सामान्यतः अगस्त – सितम्बर को मनाया जाता है। बारिश के इस मौसम में वन-उपवन, खेत आदि हरियाली की चादर से लिपटे होते हैं। संपूर्ण प्रकृति हरे रंग के मनोरम दृश्य से मन को तृप्त करती है। इसलिए यह त्योहार हरियाली तीज भी कहलाता है।

सुहागन के साथ कुंवारी भी करती हैं तीजा 

छत्तीसगढ़ का तीजा ऐसा फेस्टिवल है, जिसे अच्छे पति की कामना के साथ कुंवारी लड़की निर्जला व्रत रखती है। वहीं सुहागन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला तीजा का व्रत रखती है, साथ ही दीर्धायु के साथ पति को यश भी प्राप्त हो। और अगले 7 जन्म तक पति का साथ मिले। विधवा महिलाएं भी तीजा का व्रत रखती हैं, ताकि अगले जन्म में उन्हें अखंड सौभाग्य मिल सके। छत्तीसगढ़ में जब एक बार महिलाएं तीजा का व्रत रखना शुरू करती हैं तो वृद्धा अवस्था तक इस व्रत को रखती हैं। पुरानी बस्ती निवासी शैल शर्मा का कहना हैं कि एक बार व्रत करने के बाद जीवन भर महिलाएं तीजा रखती हैं।




सूर्योदय से तीजा की शुरुआत

सूर्योदय होने के साथ ही तीजा का व्रत रखने वाली महिलाएं उठ जाती है। तीजा की पूजा 4 पहर में की जाती है। सुबह के पहर में यानी सुबह 8 बजे के अंदर बालू, मिट्टी और रेत से निर्मित शिवलिंग बनाई जाती है। और फलेरा सजाया जाता है। इसे स्थापना पूजा कहते है। इसके बाद दोपहर 12 बजे मध्याहन पूजा की जाती है। शाम 6 से 7 बजे के बीच प्रदोष काल में संध्या पूजा की जाती है और रात 12 बजे श्यान पूजा की जाती है। 12 बजे के बाद महिलाएं भजन, कीर्तन करती हुई रात्रि जागरण करती है। डगनिया निवासी सुनीता शर्मा का कहना हैं कि रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। इसमें कंवारी लड़कियां अच्छे वर के लिए और सुहागन महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए तीजा रखती हैं।

सोलह श्रृंगार करेंगी सुहागिनें

सभी विवाहिताएँ इस दिन विशेष रूप आकर्षक परिधानों से सोलह श्रृंगार करती हैं। हाथों में बेहद आकर्षक मेहंदी लगाती हैं। तीज के मौके पर यदि कन्या ससुराल में है, तो मायके से तथा यदि मायके में है तो ससुराल से मिष्ठान, कपड़े आदि भेजने की परम्परा है। मायके से भेंट में मिले नए वस्त्र-आभूषण से सुसज्जित हो कर माता पार्वती की उपासना करती हैं। शाम को शृंगार कर कर ग्रुप में महिलाएं उत्सव मनाती हैं। रातभर भक्ति के साथ रात जागरण करती है। इस दौरान भजन-कीर्तन के साथ आस-पड़ोस की महिलाएं भी रतजगा में जुटती हैं।

धार्मिक मान्यता और पौराणिक कथा

हरतालिका तीज व्रत भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। श्री भविष्योत्तर पुराण नामक ग्रंथ में “हरितालिका तीज” की कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। हिमालय पर गंगा नदी के तट पर माता पार्वती ने भूखे-प्यासे रहकर तपस्या की थी। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता हिमालय बेहद दुखी हुए। एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से माता पार्वती के विवाह का प्रस्ताव लेकर आए लेकिन जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो, वे विलाप करने लगी। एक सखी के पूछने पर उन्होंने बताया कि, वे भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रही हैं। इसके बाद अपनी सखी की सलाह पर माता पार्वती वन में चली गई और भगवान शिव की आराधना में लीन हो गई। इस दौरान भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की आराधना में मग्न होकर रात्रि जागरण किया। माता पार्वती के कठोर तप को देखकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और पार्वती माता की इच्छानुसार उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। तभी से अच्छे पति की कामना और पति की दीर्घायु के लिए कुंवारी कन्या, सौभाग्यवती स्त्रियां हरतालिका तीजा का व्रत रखती हैं। इस दौरान भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।

इसलिए नाम पड़ा हरतालिका

तीज उपवास पौराणिक काल से हमारी परंपरा में चलन में है। पार्वती के उपवास रहने की जानकारी पौराणिक साहित्यों में मिलती है। जब मां पार्वती अविवाहित थीं, तब वे भोलेनाथ को अपने पति के रूप में पाने के लिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए यह उपवास करती हैं। इस समय पार्वती की सहेलियों ने अगवा कर लिया था। इस कारण व्रत को हरितालिका भी कहा गया है, क्योंकि “हरत” मतलब अगवा करना और “तालिका” मतलब सहेली अर्थात सहेलियों द्वारा अगवा करना ही हरितालिका कहलाता है।



पूजा की विधि

तीज के तेरह चलन 

  1.  तीज का व्रत निर्जला किया जाता है अर्थात पूरे दिन और रात अगले सूर्योदय तक कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता।
  2. वृद्ध या बीमार महिलाओं को निर्जला व्रत रखने से छूट दी जाती है।
  3. तीज का व्रत कुंवारी कन्याएं और सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा किया जाता है।
  4. इस व्रत का नियम है कि इसे एक बार शुरू करने के बाद बीच में नहीं छोड़ा जा सकता।
  5. इस दिन महिलाएं नए वस्त्र पहनकर नाच-गान व भजन के साथ रतजगा करती हैं।
  6. पूजन प्रदोषकाल में किया जाता है, यानी दिन और रात के मिलने के समय में।
  7. तीज के पूजन हेतु शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बालू रेत या काली मिट्टी से बनाई जाती है।
  8. फुलेरा बनाकर उसे सजाया जाता है। उसके अंदर रंगोली से चौक डालकर उस पर पटा या चौकी रखी जाती है। चौकी पर एक थाल के ऊपर केले का पत्ता रखकर उस पर मूर्तियां स्थापित की जाती हैं।
  9. एक कलश बनाया जाता है। इस पर श्रीफल रखते हैं या एक दीपक जलाकर रखा जाता है।
  10. सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है फिर शिव जी की और फिर पार्वती की पूजा की जाती है।
  11. इसके बाद हरितालिका व्रत की कथा पढ़ी और सुनी जाती है।
  12. ककड़ी और हलवे का भोग लगाया जाता है और इसी भोग से महिलाएं अपना उपवास तोड़ती हैं।
  13. अंत में सभी वस्तुएं एकत्र कर नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है।

परंपरा

विशेष रस्म: सात पर्री भरना 

  • शादी के बाद जिनकी पहली तीजा होती है, उनके लिए तीजा काफी खास होता है। पूजा के वक्त बांस की 7 पर्री में सुहाग का सामान रखकर पूजा की जाती है। इसे शिव-पार्वती को चढ़ाया जाता है। फिर सात सुहागन महिलाओं में बांट दिया जाता है।
  • इस पर्व पर प्रायः नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुला लेने की परम्परा है।
  • यदि कन्या ससुराल में है, तो मायके से तथा यदि मायके में है, तो ससुराल से मिष्ठान, कपड़े आदि भेजने की परम्परा है। इसे स्थानीय भाषा में ‘तीज’ की भेंट कहा जाता है।
  • इसमें अनेक भेंट वस्तुएँ होती हैं, जिसमें वस्त्र व मिष्ठान होते हैं। इसे माँ अपनी विवाहित पुत्री को भेजती है। पूजा के बाद इसको सास को सुपुर्द कर दिया जाता है।
  • सभी विवाहिताएँ इस दिन विशेष रूप से श्रृंगार करती हैं। सायंकाल बन-ठनकर सरोवर के किनारे उत्सव मनाती हैं और उद्यानों में झूला झूलते हुए पारंपरिक गीत गाती हैं।

 

कजरी गीत का एक उदहारण


संगी हो जय जोहर …. हमर छत्तीसगढ़ महतारी के पूरा तिहार …. कतका सुग्घर इ तिहार इ  .. तिहार में याद मा ….. एक भाई है अपन मायरू ..जो माइका म दाई ददा घर पहुना गे हे तेखर याद मा ओखर गुस्साइयाँ ह….
ये गीत लिखे हे जेखर दू लाइन सुनावत हो…
तीजा पोरा वर लेहे आहु मयारू मया दया रखे रहिबे ना…..
ए गा बाबू के ददा तीजा पोरा में लेहे आबे  रद्दा  देखत रैहो ना….
संगी हो सुते के बेरा हो गे ता मोला दो बीड़ा जतका भाई बहिनी मन ल…
मोर डहर ले पोरा तिहार के टुकना टुकना बधाई हे …..




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