शिक्षक दिवस विशेष: कमार बच्चों की बोली सीख बनाई डिक्शनरी, रेबिट को खरगोश नहीं खड़ाहो, डॉग को पढ़ा रहे केंकलो - गोंडवाना एक्सप्रेस
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शिक्षक दिवस विशेष: कमार बच्चों की बोली सीख बनाई डिक्शनरी, रेबिट को खरगोश नहीं खड़ाहो, डॉग को पढ़ा रहे केंकलो

रायपुर (एजेंसी) | धमतरी जिले के नगरी ब्लॉक का जंगली क्षेत्र का एक छोटा सा गांव मशानडबरा, जहां के सरकारी प्राइमरी स्कूल के शिक्षक व सफाईकर्मी ने अपनी पहल से बच्चों में शिक्षा का माहौल ही बदल दिया। जिस गांव में पिछले कुछ साल पहले माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते थे, बच्चे भी वहां नहीं आना चाहते थे, अब वहां 26 बच्चे नियमित बिना किसी गैप के हर दिन स्कूल आते हैं।

मशानडबरा में दत्तक कमार जाति के लोग रहते हैं। वहां बच्चे न तो हिंदी न ही छत्तीसगढ़ी बोलते हैं, ऐसे में वे बच्चे स्कूल नहीं आना चाहते थे न ही परिजन उन्हें भेजना। चार साल पहले वहां शिक्षक निकेश शर्मा और गोविंद साहू आए और समस्या देखी। स्कूल के सफाईकर्मी की मदद लेकर उन्होंने पहले तो वहां की कमार बोली सीखी और घर-घर जाकर उनके माता-पिता को समझाया। गर्मी में रोजाना स्कूल लगाकर बच्चों को पढ़ाया। इतना ही नहीं उन्होंने बच्चों के लिए हिंदी-अंग्रेजी के साथ कमार भाषा की डिक्शनरी बनाई, जिससे बच्चों को अब वे पढ़ाते हैं।

बच्चों को बुलाने जाते तो माता-पिता भगा देते थे

स्कूल के शिक्षक निकेश ने बताया कि 2013 में वे जब स्कूल में आए तो यहां 4-5 बच्चे ही पढ़ते थे। गांव में देखा कि अधिकतर लोग सुबह होते ही खाना खाकर जंगल चले जाते हैं और शाम को मछली व लकड़ी लेकर लौटते हैं। बच्चे स्कूल नहीं भी जाए तो उन्हें मतलब नहीं, अधिकतर तो उनके साथ ही जंगल चले जाते थे। पहले तो स्कूल के सफाईकर्मी नंद कुमार के साथ घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए समझाया, लेकिन वे हमें भगाने लगे। उन्हें पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं था। कई बार तो वे हमें घर पर दिन में मिलते ही नहीं थे।

ऐसे में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता दीप्ति साहू व सहायिका साजन साहू के साथ हम सुबह 5 बजे उनके घर जाकर मिलने लगे और उन्हें और बच्चों को स्कूल भेजने को राजी किया। कई बार तो गांव में रात को रुककर वहां लोगों को इसके लिए राजी किया। इसका कुछ असर भी हुआ। 2015 में साथी शिक्षक गोविंद भी आए व सफाईकर्मी सतानंद की मदद मिली। इनके साथ हमने पहले यहां देखा कि बच्चे हिंदी और छत्तीसगढ़ी नहीं समझते हैं और न ही वे इसे बोल पाते हैं। ऐसे में गांव के कुछ युवाओं और सफाईकर्मियों की मदद से हमने उनकी कमार बोली सीखी तो फर्क आया।

निकेश ने बताया कि स्कूल के दो सफाईकर्मियों ने काफी मदद की। उनमें से एक इसी गांव का था, उसने कमार बोली बोलने और उसके अर्थ को लेकर जानकारी दी। बच्चे डीओजी डॉग लिखा देखकर उसे कुत्ता नहीं बल्कि केंकलो बोलने पर जानते हैं। इसी तरह उनकी बोली में रैबिट को खरगोश बोलने पर नहीं बल्कि खड़ाहो से समझते हैं। उनकी डिक्शनरी में व्हाइट सफेद को पांडरो, रिवर नदी को नदू, ब्लैक को काला मसीयो, काउ को गाय नहीं बैला बोलते हैं। इस पहल से आज स्कूल के बच्चे खुद ब्लाक बोर्ड पर लिखे शब्द हिंदी, अंग्रेजी और कमार बोली में लिख-पढ़ लेते हैं।

धमतरी कलेक्टर रजत बंसल ने कहा, ‘‘मशान डबरा गांव में कमार जाति के लोग हैं, जो जंगल पर निर्भर रहते हैं। वहां के प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों की पहल से बच्चों के पढ़ाई का स्तर सुधरा है। वहां के युवाओं को रोजगार दिलाएंगे।’’

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