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जज़्बा: नक्सल प्रभावित जिले सुकमा की दिव्यांग आदिवासी बेटी सोड़ी भीमे नृत्य में कर रही नाम रोशन

सुकमा (एजेंसी) | यह कहानी है छत्तीसगढ़ का धुर नक्सल प्रभावित इलाके सुकमा की। जहां 11 वर्षीया एक दिव्यांग आदिवासी बेटी सोड़ी भीमे भी डांस में अपना नाम रोशन कर रही है। महज 3 वर्ष की उम्र में एक हादसे के दौरान अपना एक पैर गंवाने वाली सोड़ी को लोग अब डांसिंग क्वीन के नाम से जानते हैं। दिव्यांग आवासीय विद्यालय की कक्षा 4 में पढ़ने वाली सोड़ी को डांस करना बहुत पसंद है।

स्कूल में बच्चों को डांस करते देखा तो खुद को रोक नहीं सकी

सोड़ी भीमे के थोड़ा बड़ा होने पर उसके परिजनों ने दाखिला दिव्यांग आवासीय स्कूल में करा दिया। वहां साथ पढ़ने वाले दिव्यांग बच्चों को उसने डांस करते देखा। किसी बच्चे के हाथ नहीं थे तो कोई देख नहीं सकता था। इससे प्रेरणा लेकर सोड़ी ने भी डांस करना शुरू किया। उसकी यह कोशिश रंग लाई और वह आम बच्चों के साथ ही डांस सीखने लगी। उसकी कोशिशों का ही असर था कि 15 अगस्त को जिला प्रशासन के स्वंतत्रता दिवस समारोह में हजारों की भीड़ के सामने उसने भी नृत्य किया। उसकी इस हुनर को देख जिला प्रशासन ने प्रमाणपत्र देकर सम्मानित भी किया।

तीन साल की उम्र में खेलते समय अलाव से जल गया था पैर

ग्रामीण आदिवासी समाज विकास संस्था के श्यामराव धवले बताते हैं कि ठंड के समय सोड़ी के घर के आंगन में लकड़ियां जल रही थीं। वहीं पास ही में तीन साल की सोड़ी खेलते हुए आग तक पहुंच गई और उसका दाहिना पैर जल गया। परिजनों ने देखा तो उसे अस्पताल ले जाने की जगह आसपास ही उपचार कराते रहे। इसके चलते सही इलाज नहीं मिलने से उसका पूरा पैर ही खराब हो गया और काटना पड़ा। हादसे के कई सालों बाद तक सोड़ी गुमसुम रही। परिजनों ने उसे स्कूल भेजा, लेकिन वहां भी खामोश रहती, हालांकि बाद में उसने अन्य बच्चों से घुलना-मिलना शुरू किया।

जिला प्रशासन करता है आवासीय विद्यालय का संचालन

2017 में जिला प्रशासन के सहयोग से ग्रामीण आदिवासी समाज विकास संस्थान की ओर से जिला दिव्यांग पुनर्वास केंद्र का संचालन किया जा रहा है। यहीं पर दिव्यांग बच्चों के लिए आवसीय विद्यालय भी है। इस विद्यालय में दिव्यांग बच्चों के रहने के साथ ही उनकी शिक्षा और अतिरिक्त गतिविधियों के बारे में प्रयास किया जाता है। इसमें बच्चों के खेलने और उनकी रुचि के अनुसार तमाम गतिविधियों का संचालन होता है, जिससे यहां पढ़ने वाले बच्चे अपने को किसी से कम नहीं समझे और बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें।

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