व्यक्ति विशेष: सुभाषिनी मिस्त्री, पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है सुभाषिनी देवी, सब्जी की दुकान से पद्मश्री तक का सफर…

ये एक ऐसे शख्स की कहानी है जिन्होंने जिंदगी के सारी चुनौतियों का डटकर सामना किया और अपनी मंजिल पाकर राष्ट्रपति भवन पहुंचीं। यह कहानी शुरू हुई 1943 से जब बंगाल में अकाल का भीषण पड़ा था। एक बड़ी संख्या में लोग इसमें अपनी जान गवां चुके थे। इसी बीच एक नन्हीं लड़की ने अपनी आंखें खोलीं। अकाल जैसी आपदा के बीच वह जैसे-तैसे बड़ी होती है।

वह महज 12 साल की रही होगी, जब उसकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद उसने एक बेहतर जिंदगी बितानी शुरू ही की थी कि 23 की उम्र में उसके पति का देहांत हो जाता है।

कारण था ग़रीबी!

असल में उसके पास इतना धन नहीं था कि वह अपने पति का इलाज करा पाती। पति का साथ छूट जाने के बाद अमूमन महिलाएं परिवार के दूसरों लोगों पर निर्भर हो जाती है, किन्तु उस लड़की ने दूसरा रास्ता चुना।




यह दूसरा रास्ता था, आत्मनिर्भर बनने का!

इसके लिए उसने सब्जी बेचना शुरु कर दिया और आगे चलकर गरीबों के लिए एक मसीहा बनकर उभरी। हाल ही में उन्हें पद्मश्री जैसे बड़े सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। जी हां! यहां बात हो रही है सुभाषिनी मिस्त्री की।

चूंकि, वर्तमान में वह ‘गरीबों की मसीहा’ कही जाती हैं, इसलिए जानना दिलचस्प हो जाता है कि वह इस मुकाम तक कैसे पहुंचीं।

अकाल में जन्म और 12 की उम्र में शादी

सुभाषिनी का जन्म 1943 के दौरान बंगाल में आए भीषण अकाल के दौरान हुआ था। उनके कुल 14 भाई बहन थें, जिनमें से सात अकाल की भेंट चढ़ गए। पिता किसान थे, किन्तु उनके पास इतनी जमीन नहीं थी कि वह कभी दाल-रोटी से आगे की सोच पाते। ऊपर से तात्कालीन अकाल ने उनकी कमर तोड़ दी थी। मजबूरन उन्हें पिता खेती बाड़ी के अलावा मज़दूरी शुरू करनी पड़ी। इस तरह जैसे-तैसे बस परिवार का पेट पल रहा था। ऐसे में सुभाषिनी का स्कूल जाना तो दूर उनकी आम जरूरतें तक पूरी नहीं हो सकीं।

वह 12 साल की रही होंगी, जब उनके पिता ने हंसपुकुर गाँव में रहने वाले ‘चंद्र मिस्त्री’ नामक एक खेतीहर मजदूर से उनकी शादी कर दी। इस तरह सुभाषिनी मायके से ससुराल आ गईं। उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। बस नहीं बदली थी तो उनकी बदहाल हालात। पिता के घर की तरह पति के घर में भी गरीबी ने अपने डेरा जमा रखा था।

इलाज के अभाव में पति ने तोड़ा दम

खैर, जीवन आगे बढ़ा तो 21 साल की उम्र तक वह एक बेटी और तीन बेटों की मां बन गईं। यह वह दौर था, जब सुभाषिनी का जीवन पटरी पर लौट रहा था। लग रहा था उनके अच्छे दिन आने वाले हैं, तभी बीमारी के चलते एक दिन अचानक उनके पति का निधन हो जाता है।

कहते हैं कि उनके पति को आंत्रशोथ की मामूली सी बीमारी थी, जिसका इलाज उस समय भी संभव था। किन्तु, पति की तबियत ज्यादा खराब होने पर जब वह उन्हें लेकर घर से निकलती, तो गांव के आसपास कोई अस्पताल ना होने के कारण उनको इधर-उधर भटकना पड़ता था।

वह जैसे-तैसे करके पति को लेकर शहर के एक सरकारी अस्पताल में पहुँचती हैं, जहाँ डॉक्टरों ने इलाज के लिए पहले पैसे मांगे। गरीबी से जूझ रही मिस्त्री के लिए अचानक पैसे जुटाना किसी बड़े पहाड़ को तोड़ने जैसा था। उन्होंने बहुत कोशिश की, लेकिन वह पैसे नहीं जुटा पाईं। नजीता यह रहा कि उनके पति का इलाज नहीं हो सका और उनके पति ने आंखें मूंद लीं। इस तरह महज 23 साल की उम्र में वह विधवा हो गईं।

दर्द के बीच ढूंढा जिंदगी का लक्ष्य

इस घटना ने सुभाषिनी को अंदर से झकझोर कर रख दिया। पति के निधन के बाद उनके कंधों पर चार बच्चों का पेट पालने की बड़ी जिम्मेदारी थी। सुभाषिनी मिस्त्री को अपनी जिंदगी में इतनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा कि वह कभी जिंदगी को जी ही नहीं पाई। हां उन्होंने इतने बड़े दर्द में अपने जिंदगी का लक्ष्य जरूर ढूंढ लिया था। वह पढ़ी लिखी तो नहीं थीं, लेकिन उनके हौसले बुलंद थे।

उन्होंने खुद से दृढ़ संकल्प किया कि वह किसी भी कीमत पर हार नहीं मानेगीं और अपने परिवार और समाज के लिए आगे बढ़ेगीं। इसके लिए उन्होंने दिन-रात एक करके खुद को पूरी तरह से काम में झोंक दिया।

बावजूद इसके घर का खर्च पूरा नहीं हुआ, तो दो बच्चों को अनाथालय में रख दिया। अपनी चारों संतानों में उन्होंने पाया कि उनका एक बेटा ‘अजोय’ होनहार है, जिसे शिक्षा मिल जाए तो वह नाम कर सकता है। बस फिर क्या था, उन्होंने उसकी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना शुरू कर दिया। साथ ही अपने बेटे अजोय को पढ़ा-लिख कर डॉक्टर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। जैसै ही अजोय ने मां के इस सपने को साकार करने की हामी भरी, वैसे ही सुभाषिनी ने प्रण लिया कि अब वह किसी गरीब को इलाज के अभाव में मरने नहीं देंगी।

जी हां! सुभाषिनी मिस्त्री का यह संकल्प था कि वह अपने गांव हंसपुकुर में एक ऐसा अस्पताल बनवाएगीं, जिसमें उनके जैसे गरीबों का मुफ्त इलाज हो सके।

सब्जी बेचकर शुरू किया नया सफर

अस्पताल बनवाना इतना आसान तो नहीं था, लेकिन सुभाषिनी मिस्त्री कहाँ रुकने वाली थीं। उन्होंने पास के ‘धापा’ गांव में सब्जी की दुकान लगाकर सब्जियां बेचना शुरू कर दिया। इससे उनकी कमाई ज्यादा अच्छी नहीं होती थी, इसलिए उन्होंने इसे बढ़ाने कि लिए खुद ही सब्जी उगानी शुरु कर दी।

उनकी यह योजना काम आई और उनकी कमाई बढ़ने लगी

इसी बीच उन्होंने अपना एक पोस्ट ऑफिस में बचत खाता खुलवा लिया और बचत के पैसे उसमें जमा करने लगीं। इतने भर से काम चलने वाला नहीं था, इसलिए उन्होंने ज्यादा पैसों के लिए लोगों के जूते तक पॉलिश किए, दूसरों के घरों में आया बनकर के बर्तन भी धोए। अब उनके परिवार का भरण-पोषण अच्छे से होने लगा था। अजोय की पढ़ाई भी पटरी पर थी, जिसे देखकर सुभाषिनी का हौसला बढ़ता रहा। फिर वह दौर भी आया, जब आजोय की पढ़ाई खत्म होने की कगार पर थी।




उधर सुभाषिनी के गांव वालों को पता चला कि वह गांव में अस्पताल बनवाने के लिए इतनी मेहनत कर रही हैं, तो वह भी उनके साथ हो लिए। लोगों के साथ के बाद सुभाषिनी को मंजिल नजदीक नज़र आने लगी थी।

दो दशक बाद रंग लायी कड़ी मेहनत

आखिरकार वह दिन भी आ ही गया, जिसके लिए सुभाषिनी मिस्त्री दो दशक से दिन-रात एक करके मेहनत कर रही थी। 1992 में सुभाषिनी ने हंसपुकुर गांव में 10,000 रुपए में जो एक एकड़ जमीन खरीदी। उस पर आस-पास के लोगों की मदद से 1993 में एक टेम्पररी शेड लगाकर अस्पताल शुरु हो गया।

इस अस्पताल को ‘ह्यूमैनिटी हॉस्पिटल’ नाम दिया गया. लाउडस्पीकर की मदद से शहर के डॉक्टर्स से मुफ्त इलाज करने के लिए अनुरोध किया गया। कुछ डॉक्टर्स इसके लिए तैयार हो गए। यह सुभाषिनी के लिए सुकून भरा था कि अस्पताल खुलने के पहले दिन ही करीब 252 मरीजों का मुफ्त इलाज किया गया।

कुछ दिनों सब कुछ ठीक चला। फिर बरसात ने नई मुसीबत खड़ी कर दी। बारिश का पानी अक्सर अस्पताल के अंदर भर जाता। इस कारण कई बार रोड के ऊपर ही मरीजों का इलाज करना पड़ता। इससे निपटने के लिए अजोय ने स्थानीय सांसद के आगे मदद की गुहार लगाई। उनकी कोशिश कामयाब रहीं और अस्पताल के टेम्परेरी शेड सीमेंट की छत में बदल दी गई।

1996 में बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल के.वी. रघुनाथ रेड्डी ने इस अस्पताल के पक्के भवन का उद्घाटन किया। उसके बाद से सुभाषिनी और उनकी टीम ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

3 एकड़ जमीन में फैला हुआ है अस्पताल

आज ‘ह्यूमैनिटी हॉस्पिटल’ के पास 3 एकड़ जमीन है. यह हॉस्पिटल 9,000 स्क्वायर फीट में बना हुआ है। अब तो यह दो मंजिला बन चुका है। आज भी यहां गरीब लोगों का मुफ्त में इलाज होता है। हां, गरीबी रेखा के ऊपर के लोगों से जरूर 10 रुपए की फीस ली जाती है। दिलचस्प बात तो यह है कि यहां महज 5000 रुपए में बड़े से बड़े ऑपरेशन हो जाते हैं। सुभाषिनी का बेटा अजय डॉक्टर बनने के बाद पूरी तरह से यहां सक्रिय है।

पैरों में चप्पल, हाथ में पद्मश्री सम्मान

पिछले साल देश 26 जनवरी 2018 को गणतंत्र दिवस मना रहा था, तभी थोड़ी देर ही सही लेकिन सही समय पर भारत सरकार ने सुभाषिनी मिस्त्री के इस महान कार्य को सराहा। साथ ही उनका नाम इस बार की पद्मश्री सूची में अंकित किया। 23 मार्च 2018 को सुभषिनी मिस्त्री के जिंदगी का वह दिन है, जिसके लिए उन्होंने जिंदगी के सारी चुनौतियों का डटकर सामना किया और अपनी मंजिल पाकर राष्ट्रपति भवन पहुंचीं।

जब सुभाषिनी राष्ट्रपति भवन पहुंची तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज पड़ा। शायद वह पहली बार किसी को पैर में चप्पल पहने हुए राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री लेते हुए देख रह थे। जिस तरह से सुभाषिनी मिस्त्री ने ‘सब्जी बेचने से लेकर पद्मश्री तक का सफर तय किया वह समूचे देश के लिए प्रेरणा स्रोत है।

“क्यों सही कहा न?, सादर प्रणाम इस माँ को।”



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