Gondwana Special

रक्षा-बंधन विशेष: जब माता लक्ष्मी ने राखी बाँधकर राजा बलि से श्री हरि को मुक्त करने कहा था

रक्षासूत्र बांधते समय एक मंत्र बोला जाता है ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’ इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। ‘रक्षा बंधन के वक्त इसी श्लोक का प्रयोग पौराणिक काल से होते रहा है। वेदव्यास द्वारा रचित 10 हजार श्लोकों वाले वामन पुराण में वर्णित कथा में महर्षि वेदव्यास ने इसकी व्याख्या की है।

बक्सर का एक नाम वामनाश्रम भी है। क्योंकि यहीं भगवान वामन का अवतार हुआ था। नगर के अंतिम छोर पर स्थित सेंट्रल जेल के अहाते में भगवान वामन का आश्रम आज भी विद्यमान है। जहां वामन द्वादसी को भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। यहीं पर माता लक्ष्मी ने भगवान को राजा बली के कैद से मुक्त कराने के लिए उसे रक्षा सूत्र बांधी थी। ऐसी मान्यता है कि तभी से सनातन धर्म में यह परंपरा चल पड़ी।

दान के वशीभूत कैद हो गए वामन भगवान

भगवान वामन के इस कथा के अनुसार तीनो लोकों पर असुरों का राज था। राजा बलि 100 यज्ञ कर रहा था। यदि वे 100 यज्ञ पूरे हो जाते तो बलि अमर हो जाता। बलि एक असुर था और घमंडी भी इसलिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उससे तीन पग भूमि मांगी और तीनों लोकों को माप दिया। तीसरे पग को रखने के लिए उसने अपना सर आगे कर दिया। फिर वामन भगवान ने दान की इस भावना देख उस पर प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। तब राजा बली ने मांगा कि हे प्रभू जब भी आंखे खोलूं आप मेरे सामने मौजूद दिखें। इस तरह से छल कर बली ने वामन भगवान को कैद कर लिया।

रक्षा सूत्र बांधकर लक्ष्मी ने बना लिया बलि को भाई

कथा के संदर्भ में शहर के प्रकांड पंडित मुक्तेश्वरनाथ शास्त्री ने बताया कि श्रीहरि ने तो अपनी लीला रच कर देवताओं को तो संकट से मुक्त कर दिया। परंतू स्वयं वे राजा बली के कैदी बन कर रह गये। ऐसा देख कर माता लक्ष्मी को बड़ी बेचैनी होने लगी। तब प्रभु का स्मरण कर उपाय सोचने लगी। राजा बली के पास गयीं और उसे स्वयं रक्षासूत्र बांधी और भाई बना लिया। रक्षाबंधन के बाद राजा बली उनसे इसके बदले कुछ मांगने को कहा। तब माता लक्ष्मी ने अपने मानस भाई से अपने सुहाग को कैद से आजाद करने की मांग की। इस तरह से बली ने वामन भगवान को आजाद किया। ऐसी मान्यता है कि उस दिन भी श्रावण मास की भाद्रा रहित पूर्णिमा तिथी थी। तभी से इस दिन को लोग रक्षा बंधन के रूप में मनाने लगे।

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