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खेलते-खेलते भी बच्चे पढ़ सकें, इसलिए 8 गांवों की हर गली को बनाया क्लासरूम

राजनांदगांव | दीवारों पर लिखे विज्ञापनों को रोज-रोज देखकर बच्चे जब कई उत्पादों को जान लेते हैं, तो फिर इसी तरह गिनती, पहाड़ा और ककहरा क्यों नहीं सीख सकते। एक शिक्षक की इसी एक सोच ने छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में खैरागढ़ ब्लाक के आठ गांवों की गलियों को क्लासरूम और दीवारों को ब्लैकबोर्ड में तब्दील कर दिया। अब बच्चे खेलते-खेलते भी अपने गांव की गलियों में स्कूल की तरह पढ़ाई करते हैं।

कुकुरमुड़ा प्राथमिक शाला के शिक्षक देवेंद्र यादव के मन में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने को लेकर सोच ने जन्म लिया। इस साेच को लेकर वे गांव के समाजसेवी बैदनाथ वर्मा के पास गए और उनसे चर्चा की। फिर इसमें महिलाओं को शामिल किया और उनके प्रयास से ये अभियान धीरे-धीरे आसपास के आठ गांवों में पहुंच गया। महिलाओं ने गांव की हर दीवारों पर गिनती, पहाड़ा, ककहरा और तमाम वे तालिकाएं बनानी शुरू कर दी, जो प्राथमिक स्तर के बच्चों को स्कूल में सिखाई जाती है।

गांव की लगभग सभी दीवारों पर अब बच्चों को स्कूल के ब्लैकबोर्ड की तरह पढ़ने का मौका मिल गया। स्कूल से आते-जाते वक्त, छुट्‌टी के दिन और खेलते हुए दीवारों पर बनी इन तालिकाओं को देखकर बच्चे गलियों में भी पढ़ाई के लिए जुट जाते हैं। शिक्षक देवेंद्र यादव ने बताया कि स्कूल में कई प्रोडक्ट्स का नाम लिया करते थे। जब उनसे पूछा गया कि इनके बारे में आपने कैसे सीखा, तो बच्चों ने दीवारों पर बने विज्ञापनों से जानने की बात कही। यहीं से मेरे मन में इस सोच को जन्म दिया।

महिलाओं की उत्सुकता ने आठ गांव तक पहुंचाया

कुकुरमुड़ा गांव की महिलाओं ने सबसे पहले ये प्रयोग गांव की दीवारों पर किया। जब इसका बेहतर प्रतिसाद मिलता देखा तो आसपास के महिला समूहों से उन्होंने चर्चा की। इसके बाद अब ये अभियान एक छोटे से गांव से होकर बाजार अतरिया, टेकापार कला, शेरगढ़, दिलीपपुर, चिचका, साल्हेभर्री और सोनपुरी तक पहुंच गया है। इन गांवों की महिलाओं ने इस पहल को बराबर तवज्जो दी और अपनी गांव की गलियों को भी स्कूल का ब्लैकबोर्ड बना डाला।

हर गांव तक इस अभियान को चलाने की तैयारी मे जुटे

अभियान का विस्तार कर रहीं कौशल, पदमा, जितेश्वरी, निशि, नर्मदा, सुनीता व अन्य पालकों ने बताया कि अब वे इस अभियान को ब्लाक के हर गांव तक पहुंचाना चाहती हैं। उन्होंने अपने और गांव के अन्य बच्चों में इसका सकारात्मक असर देखा है। बच्चों के स्तर में सुधार आ रहा है। इसके बाद वे अब ब्लाक के हर गांव की महिलाओं से संपर्क कर रहे हैं। ताकि वे भी अपने गांव में इस तरह की पहल करे और बच्चे केवल स्कूल की पढ़ाई के ही भरोसे न रहें।

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