राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – III - गोंडवाना एक्सप्रेस
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राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – III

आजादी के समय भारत में लगभग 565 रियासत थीं, जिनके शासक नवाब या राजा कहलाते थे। आजाद भारत की कई प्रमुख समस्याओं में एक समस्या इन रियासतों के विलय की भी थी। ऐसे कई राजा या नवाब थे जो आजादी और विलय को देशहित में मानते थे। इसीलिए कुछ रियासतों को छोड़ कर अधिकांश रियासतों ने स्वेच्छा से भारत के संघीय ढांचे का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया। 15 दिसंबर 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में छत्तीसगढ़ की सभी 14 रियासतों के शासको को भारत संघ में शामिल होने का आग्रह किया। महाराजा प्रवीरचंद्र भंज देव ने आदिवासियों के विकास के लिए विलय को स्वीकृति प्रदान करते हुए स्टेटमेंट ऑफ़ सबसेशन पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह 1 जनवरी 1948 में बस्तर के मध्यप्रांत में विलय होने की औपचारिक घोषणा हुई और 9 जनवरी 1948 में बस्तर मध्यप्रांत का हिस्सा बन गया। बस्तर और कांकेर की रियासतों को मिलकर बस्तर जिला अस्तित्व में आया।

झारखंड के आदिवासी नेता डॉ.जयपाल सिंह मुंडा आदिवासियों के हक की बात कर रहे थे। डॉ. अांबेडकर संविधान के भाग पांच और छ: में आदिवासियों के हक में तमाम प्रावधानों को निर्मित कर चुके थे। तो एक तरह से संविधानगत रोडमैप तैयार हो चुका था, जरुरत थी बस संवैधानिक अधिकारों को अमल में लाने की। जयपाल सिंह मुंडा कहीं न कहीं तत्कालीन बड़ी राजनीति पार्टी की चाल को समझ नही पा रहे थे। यह बात प्रवीर चंद्र भंजदेव को पसंद नही आ रही थी। वे पहले बस्तर और बाद में गोंडवाना और उसके बाद पूरे देश के आदिवासियों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने की कोशिश करने लगे।




उनके जनसंघर्षों की यदि बानगी देखी जाये तो यह समय शुरु होता है जब 13 जून 1953 को उनकी सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अंतर्गत ले ली गयी थी। ये प्रवीर की लोकप्रियता और अपनी राजनीति प्रचारित नहीं कर पाने की ही कुंठा थी जो प्रवीर पर बार-बार बड़ी ही बेरहमी से उतरी जाती थी।

इस निजी त्रासदी को झेलते हुए अपनी शक्ति प्रदर्शन करने के लिए प्रवीर नें 1955 में “बस्तर जिला आदिवासी किसान मजदूर सेवा संघ” की स्थापना की थी। सन 1957 में प्रवीर बस्तर जिला काँग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। सन 1957 में वे जगदलपुर विधान सभा का चुनाव लड़े और भारी मतों से विजयी हुए। जीतने के बाद उन्होंने स्थानीय लोगों का काम ईमानदारी से करना शुरू किया। चार साल में भंजदेव अविभाजित मध्य प्रदेश के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर चुके थे। सत्ताधारी पार्टी राजा से नेता बने प्रवीर चंद को तमाम प्रलोभन के बाद भी आदिवासी दमनकारी वाले खेमे में नहीं कर पाई। तल्खियां बढ़ती जा रही थीं। हालांकि कांग्रेस का सदस्य रहते हुए ही 1957 में वे विधायक बने थे। लेकिन आदिवासियों के प्रति सरकार के रवैए से निराश होकर 1959 में विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

मामला था मालिक मकबूजा भ्रष्टाचार कांड का। बस्तर रियासत के दौरान (सन 1943) में ही कानून बना था कि आदिवासी की जमीन गैर आदिवासी नहीं ले सकता। लेकिन आजादी के बाद उसमें संशोधन कर उसमें कई छेद कर दिये गये ताकि अगर-मगर लगा कर लूट की जा सके। जैसे अगर किसी आदिवासी को शादी ब्याह जैसे किसी जरुरी काम के लिए पैसे चाहिए तो वह अपनी जमींन गैर-आदिवासी को बेच सकता है। मगर उसे राज्य के किसी सक्षम अधिकारी से इज़ाज़त लेनी पड़ेगी। और इन सबका नतीजा यह हुआ कि एक बोतल शराब या कुछ पैसों में ही बाहरी लोग आदिवासियों के जंगल, जमीन हड़पने लगे। साल और सांगवान के जंगल धीरे-धीरे खत्म होने लगे। इसे ही मालिक-मकबूजा भ्रष्टाचार कांड नाम दिया गया।

आजादी के बाद नई सरकार एक नई नियम लेकर आई। जिसे “सेंट्रल प्रोविंसेस स्टेट्स लैंड एंड ट्रेनर आर्डर (सन 1949)” कहा गया। जिसमे काष्ठकारो को उनकी अधिगृहीत भूमि पर अधिकार हस्तांतरित कर दिए गए। लेकिन इस आदेश ने भूमि पर लगे हुए वृक्षों पर किसानो को अधिकार नहीं दिए। कुल मिलकर स्तिथि जस की तस थी। और पुराने कानून की तरह ही वृक्ष शासन की सम्पति थी।

सन 1955 में सी.पी. एंड बरार से पृथक होकर मध्यप्रदेश अस्तित्व में आई। एक नई सरकार बनी और नई सक्रियता भी देखने मिली। एक नया कानून बना “भू-राजस्व सहिंता कानून (सन 1955)”, इसके तहत भू-स्वामियों को उनकी भूमि पर खड़े वृक्षों पर स्वामित्वव अर्थात मालिक-मकबूजा हासिल हो गया। राजा प्रवीर इस कानून के अगर-मगर को अच्छे से समझ गए थे ऊपर से देखने पर यही लगता है कि सरकार ने आदिवासियों के साथ न्याय किया लेकिन असल में यह कानून भविष्य में अदूरदर्शी बनने वाला था। सागवान के लुटेरे भारत के कोने-कोने से बस्तर पहुंच गए। कौड़ियों के दाम में सागवान के जंगल साफ़ होने लगे। कभी शराब की एक बोतल के लिए तो कभी 5 या 15 रुपए में पेड़ और जमींन के पट्टे बेचे जाने लगे।




प्रवीर ने इस मसले पर भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री को कई बार चिट्ठियां लिखी लेकिन कही से कोई जवाब नहीं आया। वे मालिक-मकबूजा कानून की खामियों को उजागर करना चाहते थे, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। हुक्मरान नेताओ और महत्वकांक्षी नौकरशाहों ने अपने हितो को साधने के लिए राजा प्रवीर के विचलित मस्तिष्क और पागल होने के प्रचार करते रहे। मालिक-मकबूजा की यह लूट लम्बे समय तक बस्तर में आदिवासियों के  शोषण का घृणित इतिहास लिखती रही। मालिक मकबूजा की लूट आधुनिक बस्तर में हुए सबसे बडे भ्रष्टाचारों में से एक है जिसकी बारीकियों को सबसे पहले उजागर प्रवीर ने ही किया था। राजा ने इस भ्रष्टाचार और संशोधन का व्यापक विरोध किया।

आदिवासी विरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ जब पूर्व राजा की सक्रियता बढ़ गई तब 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर राजा प्रवीर को धनपूंजी गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके तुरंत बाद कार्यवाही करते हुए “प्रिवेंटिंग डिटेंशन एक्ट” के तहत उन्हें गिरफ्तार कर नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। इसके अगले ही दिन तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने कार्रवाई आगे बढ़ाते हुए 12 फरवरी 1961 को राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से प्रवीर के भूतपूर्व राजा होने की मान्यता समाप्त कर दी। और राजा के रूप में मिली उनकी सुविधाएं भी समाप्त कर दीं।इसके बाद प्रवीर के छोटे भाई विजयचन्द्र भंजदेव को भूतपूर्व शासक होने की मान्यता दे दी गई। बस्तर के आदिवासियों को विजयचन्द्र भंजदेव के लिए ‘महाराजा’ की पदवी मान्य नहीं थी। हा मगर बस्तर की जनता से उन्हें ‘सरकारी राजा’ की पदवी अवश्य प्राप्त हुई।

बस्तर के आदिवासी अपने राजा पर हुए सरकार के इस कदम से हैरान थे। एक तरह से बस्तर में विद्रोह की स्थिति खड़ी हो गई। राजा के समर्थन में लौहण्डीगुडा तथा सिरिसगुड़ा में आदिवासियों द्वारा व्यापक प्रदर्शन किया गया था। आदिवासियों में राजा के प्रति लोकप्रियता से चिढ़कर प्रशासन ने आदिवासियों का दमन करने का निश्चय किया। जिला प्रशासन की जिद और प्रवीर पर हो रही ज्यादतियों का परिणाम 31 मार्च 1961 का लौहंडीगुड़ा गोली काण्ड़ था, जहाँ बीस हजार की संख्या में उपस्थित विरोध कर रहे आदिवासियों पर निर्ममता से गोली चलाई गयी थी, जिसमें अनेक आदिवासी मारे गये। सोनधर, टांगरू, हडमा, अंतू, ठुरलू, रयतु, सुकदेव; ये कुछ नाम हैं जो लौहण्डीगुड़ा गोलीकाण्ड के शिकार बने।

आजाद भारत में ये पहली बार था जब इतने सारे आदिवासियों को गोलियों से भून दिया गया। राजा को लग चुका था कि हमें अलग से राजनीतिक राह बनानी होगी।

कहानी जारी रहेगी…



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