राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – V

आज हम राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया सीरीज की आखिरी कड़ी पेश कर रहे है। इसमें पढ़िए किस तरह राजा प्रवीर समेत अनेको आदिवासियों को बड़ी ही निर्ममता से गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतर दिया गया।

इस कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा था कि किस तरह प्रवीर पर बस्तर को नागालैंड बनाने तथा हिंसक प्रवृत्तियों को भडकाने के आरोप लगते रहे हैं तथापि गंभीर विवेचना करने पर ज्ञात होता है कि उनके अधिकतम आन्दोलन शांतिप्रिय तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परिधि में ही थे। 1964 ई. में प्रवीर ने पीपुल्स वेल्फेयर एसोशियेशन की स्थापना की। 12 जनवरी 1965 को प्रवीर ने बस्तर की समस्याओं को ले कर दिल्ली के शांतिवन में अनशन किया था।

गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा द्वारा समस्याओं का निराकरण करने के आश्वासन के बाद ही प्रवीर ने अपना अनशन तोडा था। 6 नवम्बर 1965 को आदिवासी महिलाओं द्वारा कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया गया जहाँ उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके विरोध में प्रवीर, विजय भवन में धरने पर बैठ गये। 16 दिसम्बर 1965 को आयुक्त वीरभद्र ने जब उनकी माँगों को माने जाने का आश्वासन दिया तब जा कर यह अनशन टूट सका। 8 फरवरी 1966 को पुन: जबरन लेव्ही वसूलने की समस्या को ले कर प्रवीर द्वारा विजय भवन में अनशन किया गया। 12 मार्च 1966 को नारायणपुर इलाके में भुखमरी और इलाज की कमी को ले कर प्रवीर द्वारा पुन: अनशन किया गया। प्रवीर के आन्दोलन व्यवस्था के लिये प्रश्नचिन्ह बने हुए थे जिनका दमन करने के लिये आदिवासी और भूतपूर्व राजा के बीच के बंध को तोडना आवश्यक था।




इस बीच ठीक दो दिन बाद एक बडी घटना घट गयी। तारीख 18 मार्च 1966 शाम के साढे तीन बजे थे। चैत पूजा के लिये लकड़ी का बड़ा सा सिन्दूर-तिलक लगा हुआ लठ्ठा महल के भीतर ले जाया जा रहा था। कंकालिन गुड़ी के सामने परम्परानुसार इस स्तम्भ को लगाया जाना था। इस समय कहीं किसी तरह की अशांति नहीं और न ही कोई उत्तेजना। महिलाओं की संख्या चार सौ से अधिक होंगी। इस समूह में पुरुष भी थे, पूरी तरह नि:शस्त्र, जो संख्या में डेढ़ सौ से अधिक नहीं थे। महिलाओं में अधिकांश के बदन पर नीली साड़ी थी और पुरुषों के सिर नीली पगडियाँ; यह वेशभूषा प्रवीर नें अपने समर्थकों को दी थी जिन्हें वे मेम्बर तथा मेम्ब्रीन कहते थे। यह जुलूस महल के प्रमुख प्रवेश –सिंह द्वार के निकट पहुँचा ही था कि एकाएक उस पर लाठीचार्ज हो गया। यह लाठीचार्ज पुलिस ने अकारण ही कर दी थी। पुलिस भीड़ को काबू करने आई थी ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। इसके बाद स्थिति विस्फोटक हो गयी तथा तबतक महल के बाहर उत्तेजित ग्रामीणों नें तीर-कमान निकाल लिये थे। इस अप्रिय स्थिति को प्रवीर के हस्तक्षेप के बाद ही टाला जा सका था। स्थिति यही नहीं थमी।

25 मार्च 1966 के दिन राजमहल में सामने का मैदान आदिम परिवारों से अटा पड़ा था। कोंटा,उसूर, सुकमा, छिंदगढ, कटे कल्याण, बीजापुर, भोपालपटनम,कुँआकोंडा, भैरमगढ, गीदम, दंतेवाडा, बास्तानार, दरभा, बकावण्ड, तोकापाल लौहण्डीगुडा, बस्तर, जगदलपुर,कोण्डागाँव, माकडी, फरसगाँव, नारायणपुर जिले के कोने कोने से या कहें कि विलुप्त हो गयी बस्तर रियासत के हर हिस्से से लोग अपनी समस्या, पीड़ा और उपज के साथ महल के भीतर आ कर बैठे हुए थे।

भीड़ की इतनी बड़ी संख्या का एक कारण यह भी था कि अनेकों गाँवों के माझी ‘आखेट की स्वीकृति’ अपने राजा से लेने आये थे। चैत की नवदुर्गा में आदिवासी कुछ बीज राजा को देते और फिर वही बीज उनसे ले कर अपने खेतों में बो देते थे। चैत और बैसाख महीनों में आदिवासी शिकार के लिये निकलते हैं जिसके लिये राजाज्ञा लेने की परम्परा रही है। यह भी एक कारण था कि भीड़ में धनुष-वाण बहुत बड़ी संख्या में दिखाई पड़ रहे थे, यद्यपि बाणों को युद्ध करने के लिये नहीं बनाया गया था। ज्यादातर बाण वो थे जिनसे चिडिया मारने का काम लिया जाना था।

इसी बीच आदिवासियों और पुलिस में एक विचाराधीन कैदी को जेल ले जाते समय झड़प हुई जिसमे एक सूबेदार सरदार अवतार सिंह की मौत हो गयी। इसके बाद पुलिस नें आनन-फानन में राजमहल परिसर को घेर लिया। आँसूगैस छोडी गयी तथा फिर बिना चेतावनी के ही फायरिंग होने लगी। दोपहर 12 बजे तक अधिकतम आदिवासी मैदानों से हट कर महल के भीतर शरण ले चुके थे। धनुषों पर बाण चढ़ गये और जहाँ-तहाँ से गोलियों का जवाब भी दिया जाने लगा।

दोपहर के 2 बजे गोलियों की आवाज़े कुछ थमीं। सिपाहियों के लिये खाने का पैकेट पहुँचाया गया था। छुटपुट धमाके फिर भी जारी रहे। कोई सिर या छाती नजर आयी नहीं कि बंदूके गरजने लगती थीं। दोपहर के 2:30 बजे लाउडस्पीकर से घोषणा की गयी कि सभी आदिवासी महल से बाहर आ कर आत्मसमर्पण कर दें। जो लोग निहत्थे होंगे उनपर गोलियाँ नहीं चलायी जायेंगी।

प्रवीर ने औरतों और बच्चों को आत्मसमर्पण करने के लिये प्रेरित किया। लगभग डेढ़ सौ औरतें अपने बच्चों के साथ बाहर आयीं। जैसे ही वे सिंहद्वार की ओर आत्मसमर्पण के लिये बढीं,मैदान में सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया। यह जुनून था अथवा आदेश… बेदर्दी से लाठियाँ बरसाई जाने लगीं। क्या इसके बाद किसी की हिम्मत हो सकती थी कि वो आत्मसमर्पण करे?शाम 4:30 बजे एक काले रंग की कार प्रवीर के निवास महल के निकट पहुँची। प्रवीर और उसके आश्रितों को आत्मसमर्पण के लिये आवाज़ दी गयी। आवाज सुन कर प्रवीर पोर्चे (झरोखे) से लगे बरामदे तक आये किंतु अचानक ही उनपर गोली चला दी गयी, गोली जांघ में जा धँसी थी। इसके बाद महल के भीतरी हिस्सों में जहाँ तहाँ से गोली चलने की आवाज़े आने लगी थीं।




आदिम बाणों ने बहुत वीरता से देर तक गोलियों को अपने देवता के शयनकक्ष तक पहुँचने से रोके रखा। एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार बहुत से सिपाही राजा के कमरे के भीतर घुस आये थे। जब मै (प्रत्यक्षदर्शी) सीढियों से नीचे उतर कर भाग रहा था उसे गोलियाँ चलने की कई आवाजें सुनाई दीं… मै जान गया था कि उनके महाराज प्रवीर चंद्र भंजदेव मार डाले गये हैं। शाम के 4:30 बजे इस आदिवासी ईश्वर का अवसान हो गया था। प्रवीर की मृत्यु के साथ ही राजमहल की चारदीवारी के भीतर चल रहे संघर्ष ने उग्र रूप ले लिया।

अब यह प्रतिक्रिया का युद्ध था जिसमें मरने या मारने का जुनून सन्निहित था। रात्रि के लगभग 11.30 तक निरंतर संघर्ष जारी रहा और गोली चलाने की आवाजें भी लगातार महल की ओर से आती रहीं थीं। इसके बाद रुक रुक कर गोली चलाये जाने का सिलसिला अलगे दिन की सुबह 4 बजे तक जारी रहा। पुलिस ने 61 राउंड फायरिंग की। आदिवासियों के हृदय सम्राट प्रवीरचंद्र भंजदेव को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.द्वारका प्रसाद मिश्र और मुख्य सचिव आर.सी.वी.पी.नरोन्हा के निर्देश पर पुलिस ने गोलियों से भून दिया था।

अगले दिन 26 मार्च 1966 की सुबह के 11 बजे जिलाधीश तथा अनेकों पुलिस अधिकारी महल के भीतर प्रविष्ठ हो सके। और इसी शाम प्रवीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

प्रवीर बस्तर की आत्मा थे वे नष्ट नहीं किये जा सके। आज भी वे बस्तर के लगभग हर घर में और हर दिल मे उपस्थित हैं। एक राजा जिसने कभी राज नहीं किया, लेकिन हमेशा अपने लोगों के जेहन में राजा के रुप में राज किया। एक ऐसा राजा जो एक ही बार में नौ आदिवासियों को विधानसभा भेज चुका था। प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों में आदिवासियों का हक चाहता था। बस्तर की आदिवासी आबादी उम्मीदों से जगमगा रही थी। वह राजा जो आदिवासियों के लिए शिक्षा और रोजगार चाहता था, वह 25 मार्च 1966 को अपने ही महल की सीढ़ियों पर सीने में 25 गोलियां लिए पड़ा था।

यह उस समय की बात है जब लाल गलियारा नहीं बना था। भारत में नक्सलवाद नहीं था। राजा लाल गलियारा और नक्सलवाद दोनों से आदिवासियों को बचाना चाह रहा था। राजा की मौत से सरकार के प्रति आदिवासियों के मन में अविश्वास का जो भाव पैदा हुआ, वह आज तक झलकता है।

उन्होंने बस्तर की स्थिति का वर्णन करते हुए एक किताब भी लिखी थी। किताब का नाम था: आई प्रवीर – द गॉड ऑफ़ आदिवासी (I Pravir – The God of Adivasi)। सच में आदिवासी उन्हें आज भी भगवान की तरह पूजते है। यह किताब राजा ने अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व ही लिखी थी। उन्होंने यह किताब अंग्रेजी में लिखी थी। इसका हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है।

यह प्रवीर का ही व्यक्तित्व था जो उन्हें महान बनाती है। आज भी बस्तर के आदिवासी दंतेश्वरी देवी और राजा प्रवीर चंद भंजदेव में असीम आस्था रखते हैं। बस्तर के आदिवासियों में राजा प्रवीर चंद भंजदेव के प्रति लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी तस्वीर बस्तर के सभी आदिवासियों के घरों में देखने को मिल जाएगी। 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा, जो विश्व का सबसे अधिक दिनों का पर्व कहा जाता है, के मेले में प्रवीर चंद भंजदेव के फोटो की अप्रत्याशित बिक्री होती है। बस्तर के आदिवासी दंतेश्वरी देवी के साथ इनकी पूजा करते हैं।

तब से लेकर आज तक बस्तर जल रहा है। आदिवासी आज भी अपनी पहचान और हक के लिए लड़ने पर मजबूर है। एक सवाल जिसे भंजदेव हल करना चाहते थे, वह आज भी मुंह बाए खड़ा है और वहां की समस्याएं निरंतर बड़ी होती जा रही हैं।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जब केन्द्र और राज्य सरकारों ने विकास के नाम पर बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन शुरू किया तो प्रवीर चन्द्र भंजदेव ने अपने लोगों को राजनैतिक नेतृत्व मुहैया कराया। कांग्रेस को प्रवीर चन्द्र भंजदेव एक बड़ा खतरा लगे। 25 मार्च 1966 को जगदलपुर में उनके महल की सीढ़ियों पर तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने उनकी नृशंस हत्या कर दी। कुल 25 गोलियां मारी गईं उन्हें। उनके साथ सरकारी आंकड़ों के हिसाब से राजा समेत केवल 12 लोग और मारे गए।

प्रवीर चाहते थे कि बस्तर में आदिवासियों की शिक्षा-दीक्षा के लिए एक विश्वविद्यालय खोला जाए, परंतु उनकी इस महत्वपूर्ण अभिलाषा को कांग्रेस ने अपने लंबे शासनकाल में कोई तवज्जो नहीं दी। अंतत: सन 2003 के अंत में छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इसे पूरा किया गया। प्रवीर ने यह भी लिखा, ‘आदिम समुदाय को कृषि एवं आवासीय भूखंड नि:शुल्क दिए जाने चाहिए। सिंचाई के साधनों के समुचित विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।’

प्रवीरचंद्र भंजदेव इन पंक्तियों के साथ अपनी आत्म कथा का समापन करते हैं, ‘महान भारतीय सनातन धर्म अपने उस महान राष्ट्र की सहायता करे, जो विश्व की सभी संस्कृतियों तथा धर्मों को सदा दीप्त करता आया है। इस देश को जड़ता तथा आज सर्वत्र व्याप्त अंधकार से बाहर निकाल कर इसे पूर्ववत तेजस्वी एवं प्रकाशमान बना कर पुन: शेष विश्व का मार्गदर्शन करने की सामर्थ्य प्रदान करे।’ (मूल अंग्रेजी से अनुदित)

प्रवीर चंद्र भंजदेव ने यह पुस्तक अपनी हत्या से कुछ ही दिन पूर्व लिखी थी। इसे पढ़ने से लगता है, उन्हें अपनी हत्या का पूर्वाभास था। प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या के किसी भी दोषी को शासन-प्रशासन और न्यायालय ने दंडित नहीं किया, परंतु प्रामाणिक जानकारी के अनुसार इस अमानुषिक गोलीकांड के बाद डी.पी. मिश्रा कभी सत्ता में नहीं आए। असाध्य रोग से ग्रस्त होकर अपने रक्त से भीगते हुए पीड़ादायक मृत्यु को प्राप्त हुए। हत्याकांड की योजना में शामिल बस्तर के जिला कलक्टर अकबर मनोसंताप से पीडि़त होकर अंतिम सांस तक संतप्त रहे।

मुख्य सचिव नरोन्हा का युवा पायलट पुत्र राजकीय विमान की उड़ान के दौरान बस्तर के आसपास दुर्घटनाग्रस्त होकर मारा गया। उनके साथ मध्य प्रदेश के गृहसचिव और पुलिस महानिरीक्षक की भी अकाल मृत्यु हो गई। संभवत: आत्मग्लानि से ग्रस्त नरोन्हा ने प्रायश्चित के लिए भोपाल के निकट एक चर्च में पादरी बन कर शेष जीवन बिताया। उससे यह धारणा परिपुष्ट हो गई कि देवी दंतेश्वरी अपने किसी प्रिय पुजारी का अनिष्ट करने वाले को बख्शती नहीं।

अपनी आत्मकथा में प्रवीर ने लिखा था, ‘इस्पात का एक कारखाना बैलाडीला के आसपास लगाने का निर्णय केन्द्र सरकार ने लिया था, किन्तु दफ्तरी कमीशन ने आर.पी.नरोन्हा और रविशंकर शुक्ल के दबाव में इसे गोवा या विशाखापट्टनम में लगाने की सिफारिश कर दी। इसका एक मात्र कारण क्षेत्रीय नेतृत्व की कमजोरी था। राष्ट्र को इस प्रकार की बड़ी योजनाएं अन्यत्र भेजने के प्रलोभनों से बचना चाहिए।’ आत्मकथा में प्रवीर ने यह भी लिखा है कि नरोन्हा, मुख्यमंत्री के राजनीतिक एजेंट का काम करते हुए उन्हें चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करने के लिए कहा करते थे। इनकार करने पर उनकी संपत्ति ‘कोर्ट ऑफ वार्ड’ की निगरानी में रख दी गई। प्रवीर बस्तर में छोटे-छोटे उद्योगों और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के पक्षधर थे।

आत्मकथा में उन्होंने लिखा, ‘बस्तर की तुलसी डोंगरी तथा बैलाडीला पर्वत श्रंखला के आधार स्थल के आसपास के मैदानों में इस प्रकार के छोटे-छोटे उद्योग बड़ी आसानी से लगाए जा सकते हैं। किन्तु प्रशासन द्वारा बनाए गए जटिल नियमों और प्रक्रिया के कारण सीधे-सादे और अनपढ़ स्थानीय लोगों को ये सुविधाएं नहीं मिल पातीं। खनिज संपदा के दोहन के लिए बाहर के प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता के आधार पर खनिज के पट्टे दे दिए जाते हैं।

हमारे महान राष्ट्र भारत के लोग कभी भी नहीं जान पाएंगे कि यह सब उन लोगों का प्रपंच मात्र है। ये षड्यंत्रकारी इस देश के निवासियों को मोहक आश्वासनों का झुनझुना थमा कर संपूर्ण भारत में वंशानुगत सत्ता को मजबूत करना चाहते हैं।’

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