लैलूंगा का दशहरी आम बना खास, महाराष्ट्र से आ रही डिमांड, कमाई से महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर - गोंडवाना एक्सप्रेस
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लैलूंगा का दशहरी आम बना खास, महाराष्ट्र से आ रही डिमांड, कमाई से महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर

रायगढ़ (एजेंसी) | कोड़ासिया और गमेकेला की महिलाओं ने जिले में अलग पहचान बना ली है। पारंपरिक खेती और मजदूरी छोड़कर महिलाओं ने आम का बगीचा लगाया था। ‘आम’ ने इन महिलाओं को खास बना दिया। इनकी मेहनत का परिणाम अब दूसरों को भी प्रोत्साहित कर रहा है। लैलूंगा ब्लॉक की महिलाएं काजू के साथ ही अब दशहरी आम का उत्पादन कर रही हैं। खास बात कि इन आमों की मांग पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी आने लगी है। इसके चलते महिलाएं अब आत्मनिर्भर बनने लगी हैं।

30 पौधे लगाए, अब एक पेड़ से 30 से 50 किलो आम की पैदावार

महिलाओं ने 10 साल पहले छह एकड़ में 30 दशहरी आम और 25 काजू के पौधे लगाए थे। अब इनसे उत्पादन शुरू हो गया है। एक पेड़ में 30 से 50 किलो तक आम का उत्पादन हो रहा है। इससे अब हर साल एक महिला की 35 से 40 हजार तक की कमाई हो जाती है। महिलाएं आम पत्थलगांव के बाजार में बेचती हैं लेकिन महाराष्ट्र से भी डिमांड आती है। इस साल आम 2000 क्विंटल तक उत्पादन का अनुमान है।

महिलाएं बंजर भूमि में पहले किसान बारिश के समय दलहन, तिलहन का छिड़काव कर देते थे। इसमें बारिश होने पर फसल मिल जाती थी। अब इसी बंजर भूमि में आम व काजू के पौधे लगा रहे हैं। करीब छह एकड़ की बाड़ी में आम के 30 और काजू के 25 पौधे लगाए गए हैं। जिसकी देखरेख अच्छे से करने पर फल लगना भी शुरू हो गया है। शुरुआत में ही 1 हजार क्विंटल तक उत्पादन होने लगा है। सीजन के हिसाब से सब्जी की फसल ले रहे

गायत्री पैंकरा ने बताया कि वे बाड़ी में करीब डेढ़ एकड़ जमीन पर सीजन के हिसाब से फसल भी ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि बाड़ी में डेढ़ एकड़ जमीन पर खरीफ सीजन में धान की फसल लगाते हैं तो वहीं बाकी समय धान की फसल ले रहे हैं। इसके अलावा सब्जी टमाटर, आलू, प्याज, मिर्च की फसल लेते हैं। इससे उन्हें अतिरिक्त कमाई हो रही है।

सालाना कमाई 40 से 50 हजार रुपए तक

कोड़ासिया निवासी गीता पैंकरा ने बताया कि बाड़ी से अभी 40 से 50 हजार तक सालाना कमाई हो जाती है। आम की पैदावार अब शुरू हुई है। शुरुआत में 10 से 15 हजार रुपए कमा लेते थे। अब बढ़ने की संभावना है। आम के साथ काजू की पैदावार भी शुरू होने वाली है। यह धान की खेती के अतिरिक्त है। समय निकालकर बाड़ी की देखरेख कर लेते हैं। पहले इस जमीन पर कुछ नहीं होता था अब पूरे साल कुछ न कुछ फसल लगी रहती है।

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