Education & Jobs Gondwana Special

हिन्दी दिवस आज: हिंदी अंकों को पाठ्यपुस्तकों में दिलाई जगह, एक ही सपना: राष्ट्रीय भाषा को मिले सम्मान

जशपुर के आयुर्वेदिक डॉक्टर रविंद्र वर्मा एक ऐसे व्यक्ति हैं जो हिंदी व हिंदी अंकों की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर चुके हैं। उन्होंने अपनी जिद से सरकार को हिंदी अंकों की ओर ध्यान देने के लिए विवश कर दिया। डॉ. वर्मा की पहल पर सरकार में गत वर्ष से हिन्दी अंकों को पढ़ाना शुरू कर दिया है।

पहली से पांचवीं तक की किताब में अब बच्चों को हिंदी अंकों की भी जानकारी दी जा रही है। 25 साल बाद राज्य के प्राइमरी व मिडिल स्कूल के बच्चे फिर एक बार अंग्रेजी के 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 अंक के साथ-साथ हिन्दी के देवनागरी अंक भी पढ़ पा रहे हैं।

जिले के आयुर्वेदिक डॉक्टर और अंक भारती संस्था के संस्थापक डॉ. रविंद्र कुमार वर्मा ने 2017 में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को देवनागरी अंक को स्कूलों में फिर से पढ़ाने के लिए पत्र लिखा था, वहीं हाईकोर्ट में इस पर याचिका भी लगाई थी। इस पर कोर्ट ने राज्य शासन को विचार करने का आदेश जारी किया था। इसके बाद स्कूल शिक्षा विभाग के पूर्व संयुक्त सचिव ने आदेश जारी किया। एससीईआरटी ने नए सिरे से बच्चों को हिन्दी के अंक पढ़ाने के लिए शिक्षण देने का तरीका बनाया और इसे पाठ्य पुस्तक में शामिल किया।

पहचान खो चुके थे हिंदी अंक

अंग्रेजी को बढ़ावा देने की कोशिश के बाद हिंदी के अंक तेजी से पहचान खो रहे थे, इसलिए डॉ. रविंद्र कुमार वर्मा ने इसका अस्तित्व बनाए रखने के लिए शासन का ध्यान आकृष्ट कराया था। इसके बाद शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने भी इस पर शोध किया तो पता चला कि बच्चे हिंदी अंक पूरी तरह से भूल चुके हैं। शीघ्र ध्यान नहीं देने पर हिंदी अंक पूरी तरह से विलुप्त हो जाते।

1994 से गायब थे हिन्दी अंक

शिक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक मध्यप्रदेश के जमाने से ही करीब 1994 में किताबों से अचानक देवनागरी हिन्दी के अंक गायब हो गए थे। किताबों से हिंदी के अंक गायब होने से देवनागरी लिपि के लिए यह फैसला घातक था और एक पूरी भाषा से नई पीढ़ी अनजान हो चुकी थी।

20 साल से हिंदी को बढ़ावा देने लगातार कर रहे काम

डॉक्टर वर्मा बीते 20 सालों से हिंदी को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। डॉक्टर वर्मा ने बताया कि 2001 से वे हिंदी अंकों के लिए काम कर रहे हैं और उन्होंने अंक भारती नामक संस्था की स्थापना भी की है। 2013 से वे जोर शोर से इस प्रयास में जुटे हुए हैं कि हिंदी को उचित स्थान मिले। डॉक्टर वर्मा ने बताया कि एक राष्ट्रीय पत्रिका जो बीते 60 सालों से हिंदी अंकों प्रकाशित होती थी, उसने 2013 में हिंदी की जगह अंग्रेजी अंकों का प्रयोग शुरू कर दिया जिससे वह काफी आहत हुए थे। डॉक्टर वर्मा ने अपने प्रयास से सैकड़ों वाहनों में नंबर प्लेट पर नंबर हिंदी अंकों में लिखवाया है।

हिंदी मीडियम स्कूलों को बंद करने का है षड़यंत्र: वर्मा

डॉक्टर वर्मा हिंदी मीडियम स्कूलों को फिर से शुरू करने की मांग को लेकर सरकार से लगातार पत्र व्यवहार कर रहे हैं। जिला सहित प्रदेश भर में कई हिंदी मीडियम स्कूलों को बंद कर उसे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में तब्दील कर दिया है। डॉक्टर वर्मा का कहना है कि यह हिंदी के खिलाफ एक बहुत बड़ा षड्यंत्र है। इसे रोकने के लिए जन आंदोलन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मातृ शब्द का प्रयोग सिर्फ भूमि और भाषा के साथ होता है। जिस तरह भारत हमारी मातृभूमि है, उसी तरह हिंदी हमारी मातृभाषा है। इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए।

Leave a Reply