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Chhattisgarh Gondwana Special

नारायणपुर : छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरवा अउ बाड़ी : ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ शुरू

नारायणपुर. छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बावजूद यहां के मूल निवासी एवं रहवासियों को विकास का वो लाभ नहीं मिल सका, जिनके वे असली हकदार थे। गिरता हुआ भू-जल स्तर, खेती में लागत की बढ़ोत्तरी, मवेशियों के लिए चारा संकट आदि ने स्थिति को और भयावह बना दिया। साल 2019 के अंतिम माह में नई सरकार के गठन के बाद से यह छत्तीसगढ़ इस कदर बदला है कि गांधी के सिद्धांतों पर चलने लगा है।

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने प्रदेश की बागडोर संभालते ही नारा दिया- छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी नरवा, गरवा, घुरवा अउ बाड़ी एला बचाना हे संगवारी (छत्तीसगढ़ की पहचान के लिए चार चिन्ह हैं, नरवा (नाला), गरवा (पशु एवं गौठान), घुरवा (उर्वरक) एवं बाड़ी (बगीचा), इनका संरक्षण आवश्यक है। इस योजना के माध्यम से भूजल रिचार्ज, सिंचाई और आर्गेनिक खेती में मदद, किसान को दोहरी फसल लेने में आसानी हुई। पशुओं की उचित देखभाल सुनिश्चित हो सकी। परंपरागत किचन गार्डन एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मजबूती आयी है तथा पोषण स्तर में सुधार भी सुधार देखा गया है। अब हम पुरातन संस्कृति और सरोकारों को सहेज कर रखने के काम की ओर भी लौट रहे हैं। क़ोरोना वायरस संक्रमण की रोकथाम एवं नियंत्रण के चलते देशव्यापी लॉकडाउन के कारण छत्तीसगढ़ में ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में उतना फ़र्क़ नही पड़ा, जितना कि अन्य राज्यों में पड़ा है। अब छत्तीसगढ़ के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियाँ शुरू हो गई है। ग्रामीण इलाक़ों में मनरेगा, लघुवनोपज़ की ख़रीदी के साथ तेंदूपत्ता ख़रीदी काम शुरू हो गया है। जिससे ग्रामीणों की आर्थिक स्थित में और सुधार आएगा।

छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी योजना नरवा, गरूवा, घुरवा एवं बाड़ी के अंतर्गत नारायणपुर जिले की बात करें तो यहाँ पहले चरण में 15 गौठान निर्माण की अनुमति दी गई थी। जिनकी संख्या बढ़ कर अब 50 से अधिक हो गई है। जिले में 5 आदर्श गौठान बन गए हैं। गरुवा कार्यक्रम के तहत नारायणपुर के ग्राम पंचायत भटपाल में गौठान बनने से लगभग 400 मवेशियों को आश्रय मिला है और अब सड़को पर मवेशियों का विचरण कम हुआ है। गौठान में ग्रामीणों द्वारा चारे के दान के साथ-साथ मवेशियों के उचित प्रबंधन, देखरेख के लिए ग्राम स्तर पर गौठान प्रबंधन समिति का चयन किया गया है, जिनके द्वारा गौठान का संचालन प्रारंभ कर दिया गया है। जिसमें पशु अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन कर गोबर से आधुनिक खाद तैयार करने, गौ-मूत्र से कीटनाशक तैयार करने एवं गौठान स्थल पर विभिन्न प्रकार के आर्थिक गतिविधि संचालित है। ग्राम गौठान प्रबंधन समिति के सदस्यों द्वारा गौठान का संचालन करने से अब मवेशी एक जगह सुव्यवस्थित रूप से एकत्र रहते हैं। मवेशियों से फसल सुरक्षित होने से किसान भी निश्चिन्त हैं, साथ ही दुर्घटनाओं में भी कमी आयी है।

यह योजना पूरे प्रदेश भर में लागू है। बाड़ी लगाने के लिए मनरेगा से सहायता दी जा रही है तो वहीं स्व सहायता समूहों को महिला एवं समाज कल्याण की ओर से मदद दी जा रही है। ग्रामीण खुद ही आगे बढ़कर मदद कर रहे हैं। गांवों में आवारा मवेशी की समस्या कम हो रही है, इसलिए किसान दूसरी एवं तीसरी फसल लगाने को लेकर भी उत्साहित और ललायित है।

इस कार्ययोजना से गांव के महिला स्वसहायता समूहों और युवाओं को जोड़ा जा रहा है। इस योजना से पशुओं से फसल बचाने के लिए खेतों को घेरने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, किसानों को जैविक खाद उपलब्ध हो रहा है तो वहीं कृषि लागत भी कम हुई है। लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलें। प्रदेश में पहले चरण में दो हजार गौठानों के निर्माण की स्वीकृति दी गई है। वर्तमान में इनकी संख्या में बढ़ोतरी की गई है। नारायणपुर जिले की बात करें तो यहाँ पहले चरण में 15 गौठान निर्माण की स्वीकृति थी, जिनकी संख्या बढ़ कर 50 से अधिक हो गई है। जिले मैं 5 आदर्श गौठान बन गए हैं।

योजना के तहत गरूवा के आस-पास के ग्रामों के किसानों द्वारा गौठानों के लिये स्वेच्छा से पैरा दान भी किया जा रहा है। किसानों के इस कार्य की सराहना भी हो रही है। बाड़ी योजना में किसानों के घरों की बाड़ी में सब्जियों और मौसमी फलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पौष्टिक आहार उपलब्ध हो रहा है। वहीं शाला-आश्रमों, आंगनबाड़ी केंद्रो की ख़ाली पड़ी ज़मीन पर किचन गार्डन बच्चों द्वारा तैयार कर हरी सब्ज़ी-भाजी का उपयोग किया गया। वर्तमान में देशव्यापी लॉकडाउन के चलते अभी ये संस्थाएँ बंद है।

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