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भारत रत्न पं. मदनमोहन मालवीय जयंती: ब्लैक बोर्ड पर ‘राम’ लिख वाराणसी में ‘महामना’ ने शुरू की थी पाठशाला

वाराणसी (एजेंसी) | भारत रत्न से विभूषित पंडित मदन मोहन मालवीय की आज (25 दिसंबर) जयंती है। मालवीय ने गुलाम भारत में 4 फरवरी 1916 को वाराणसी में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की नींव रखी थी। यह बात सभी लोग जानते हैं। लेकिन बीएचयू की स्थापना के 13 साल बाद महामना ने गरीब बच्चों के लिए एक विद्यालय शुरू किया था। तब से अब यानी 86 साल से इस पाठशाला में बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है।

वर्तमान में यह विद्यालय ‘लाला लाजपत राय पाठशाला’ के नाम से जाना जाता है। अब इसका संचालन उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद से किया जा रहा है। यहां जूनियर हाईस्कूल तक की पढ़ाई होती है। वर्तमान में इस विद्यालय के इंचार्ज अवधेश श्रीवास्तव हैं। वह बताते हैं कि महामना ने बीएचयू में भौतिकी विज्ञान के प्रोफेसर यूए आसरानी के साथ इस पाठशाला को खोला था। शुरूआत में इसे हरिजन पाठशाला नाम दिया गया था।

पीएम मोदी ने ट्वीट करके श्रद्धांजलि अर्पित की

पीएम मोदी ने महामना मालवीय जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए लिखा, ‘भारत माता की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाले महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने के साथ आजादी के आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई। उनकी विद्वता और आदर्श देशवासियों को सदा प्रेरित करते रहेंगे।’

साल 1924 में सफाईकर्मियों के बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं मिलता था। तब मालवीय जी प्रोफेसर यूए आसरानी, डॉक्टर मंगल सिंह, चीफ इंजीनियर ज्वाला प्रसाद से ऐसी पाठशाला बनाने का जिक्र किया, जो बीएचयू कैंपस में हो और वहां गरीब, हरिजन, सफाईकर्मियों के बच्चों को शिक्षा मिल सके। सभी ने उनकी बात पर सहमति जताई।

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इसके बाद यहां सुंदर बगिया में पेड़ के नीचे प्रोफेसर आसरानी ने क्लास लेना शुरू किया। पाठशाला में बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती थी। बाद में बच्चों की संख्या देखकर महामना ने 1933 में बीएचयू के शिवाजी हाल में क्लास लगवाना शुरू की। तब विधिवत तौर पर महामना ने ब्लैक बोर्ड पर पहला शब्द राम नाम लिख पाठशाला की थी। अधिकृत तौर पर तभी से इस विद्यालय की शुरुआत हुई। महामना खुद भी बच्चों को पढ़ाते थे। यही से पाठशाला ने आगे बढ़ी। इसके बाद बीएचयू ने एक मिस्त्री भी पाठशाला के निर्माण के लिए दिया।

प्रोफेसरों ने की मजदूरी, कंधो पर ढोई ईंटें

अवधेश श्रीवास्तव बताते हैं कि इस पाठशाला के निर्माण के लिए निर्माण की तरफ से मिस्त्री दे दिया गया। लेकिन मजदूर नहीं दिए गए। यानी मजदूरी का पैसा नहीं दिया गया। ऐसे में प्रो. आसरानी, डॉ. मंगल सिंह, इंजीनियर ज्वाला प्रसाद और प्रोफेसर, छात्रों ने खुद मजदूरी का काम समय निकालकर करना शुरू किया। खुद भट्टे का निर्माण कर ईट बनाई, कंधों पर ढोई।

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