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Guru Teg Bahadur Jayanti 2020: गुरु तेगबहादुर जयंती आज, जानिए उनके बलिदान के बारे में

गुरु तेगबहादुर जयंती २०२० (Guru Teg Bahadur Jayanti 2020): आज 12अप्रैल रविवार को गुरु तेगबहादुर जयंती है. गुरु तेग बहादुर सिख धर्म के नवें गुरु थे . उनका जन्म वैशाख पंचमी संवत 1678 में अमृतसर के हरगोबिंद साहिब जी के यहां हुआ था. गुरु तेगबहादुर ने देश हित में अपना शीश तक कटा दिया और समाज के हित के लिए भी उन्होंने कई कार्य किए. गुरु तेगबहादुर ने कई साखियां भी लिखीं और कई उपदेश भी दिए.

सिख धर्म के 9वें गुरु तेग बहादुर (Guru teg bahadur jayanti 2020) का नाम एक क्रांतिकारी युग पुरुष के नाम पर जाना जाता है. विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का धर्म की रक्षा में नाम अद्वितीय है. आज गुरु तेग बहादुर जयंती सिंह की जयंती है. गुरु तेग बहादुर का जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी को पंजाब के अमृतसर में हुआ था. उनका बचपन का नाम त्यागमल था.

बाल्यावस्था में ही संत स्वरूप और गहन विचार

ऐसा कहा जाता है कि गुरु तेज बहादुर बचपन से ही संत स्वरूप और गहन विचारवान और उदार चित्त थे. वह बचपन से ही आधात्यमिक रूचि वाले पुरुष थे. गुरु तेग बहादुर 1634 में करतारपुर के युद्ध में ऐसी वीरता दिखाई कि उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेग बहादुर रख दिया. उस वक्त तेग बहादुर महज 13 साल के थे. 21 वर्ष की सतत् साधना के बाद 1665 ई. में गुरु गद्दी पर विराजमान हुए.

कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा

वर्ष 1675 की बात है गुरु तेग बहादुर के दरबार में कश्मीरी पंडितों का एक दल आया और उन्होंने बताया कि औरगंजेब जबरन लोगों को अपने धर्म परिवर्तन करने के लिए मजबूर कर रहा है. कश्मीरी पंडितों ने तेग बहादुर को बताया कि जो लोग औरंगजेब की बातों को नहीं मान रहे हैं उन पर अत्याचार किया जा रहा है. कश्मीरी पंडितों के दल ने गुरु तेग बहादुर से मदद की प्रार्थना की. गुरु जी ने कहा, ‘इसके लिए किसी महापुरुष को आत्मबलिदान देना होगा. 09 वर्षीय बालक गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा, इस बलिदान के लिए आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है.’

देश के लिए शीश कटाने का किस्सा

कश्मीरी पंडितों के दल से मुलाकात करने बाद गुरु तेग बहादुर औरंगजेब से मिलने के लिए जब गुरु तेगबहादुर अपने शिष्यों के साथ दिल्ली जा रहे थे तभी रास्ते में उन्हें सरहिंद के सूबेदार ने हिरासत में ले लिया. गुरु तेगबहादुर अपने शिष्यों के साथ चार महीने तक सरहिंद की जेल में रहे. औरंगजेब उस समय दिल्ली में नहीं था.

औरंगजेब जब दिल्ली लौटा तो गुरु तेगबहादुर को उनके सामने पेश किया गया. औरंगजेब और गुरु तेगबहादुर में कुछ धार्मिक विषयों पर चर्चा हुई. किसी बात पर औरंगजेब को क्रोध आ गया और उसने गुरु तेगबहादुर और उनके शिष्यों को मृत्युदंड सुनाया. इसके बाद उनपर कई तरह के जुल्म ढाए गए. इसके बाद उनके एक शिष्य मतिदास को आरा मशीन से कटवा दिया गया. इसके बाद औरंगजेब ने उनके दूसरे शिष्य दयालदास को खौलते हुए पानी के कड़ाहे में डलवाकर यातना दी.

इसके बाद उन्हें एक अन्य शिष्य सतीदास को आग में जला दिया गया. इसपर भी गुरु तेगबहादुर का मन कमजोर नहीं हुआ. गुरु तेगबहादुर ने इसके बाद भी औरंगजेब के सामने अपने शिष्यों की देशभक्ति की दाद दी. गुरु की इस बार पर औरंगजेब बौखला उठा. औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर का सिर कलम करने का आदेश दिया. गुरु तेगबहादुर की याद में ही दिल्ली में शीशगंज गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया है.

औरंगजेब ने तेग बहादुर के सामने रखी शर्त

औरंगजेब ने तेग बहादुर के सामने तीन शर्ते रखीं, ‘इस्लाम कबूल करें, करामात दिखाएं या शहादत दें. औरगंजेब को जवाब देते हुए गुरु जी ने उत्तर दिया ‘मैं धर्म परिवर्तन के विरुद्ध हूं, और चमत्कार दिखाना ईश्वर की इच्छा की अवहेलना है.’ इसके बाद गुरु जी के साथ दिल्ली गए तीन सिखों भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला को यातनाएं देकर शहीद कर दिया गया.

औरंगजेब ने गुरु जी पर भी अनेक अत्याचार किए. अंतत: आठ दिनों की यातना के बाद 24 नवंबर 1675 ई. को गुरु जी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया. गुरु तेग बहादुर की याद में इसी स्थान पर गुरुद्वारा शीश गंज को बनाया गया.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं. Gondwana Express इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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