#अच्छीपहल अब हर कोई गोंडी भाषा समझ सकेंगे, माइक्रोसॉफ्ट की मदद से तैयार हो रहा है टूल

रायपुर (एजेंसी) | भाषा की दिक्कत के कारण आदिवासियों के करीब न पहुंच पा रहे प्रशासन की समस्या हल करने के लिए निकट भविष्य में एक टूल अाने वाला है। इसके जरिए अफसरों की हिंदी में कही गई बात आदिवासी गोंडी में सुन पाएंगे और उनकी गोंडी में कही बात अफसरों को हिंदी में सुनाई देगी। इस टूल से फोर्स को भी आदिवासियाें का विश्वास जीतने और नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति बहाल करने में मदद मिलेगी।

कलिका बाली, जो माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च लैब्स इंडिया के साथ एक रिसर्चर हैं, का कहना है कि हमने सीजीनेट से कम से कम 10 हजार वाक्यों के हिंदी से गोंडी में अनुवाद मंगाए हैं। ट्रिपल आईटी नया रायपुर के डीन डाॅ. प्रदीप कुमार सिन्हा ने बताया कि, ‘सीजी नेट’ के दिए गए अनुवादों को माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च की देखरेख में वॉयस-बेस्ड टेक्नोलॉजी वाला सॉफ्टवेयर तैयार किया जाएगा।




इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे सीजी नेट के प्रमुख शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए पिछले कुछ दशकों में नक्सली नेताओं ने दो काम किए, पहला कि उन्होंने आदिवासियों की प्रमुख बोली गोंडी सीखी और दूसरे नक्सलियों ने आदिवासियों से अपनी दूरी कम करते हुए उनके साथ जंगल में ही रहने लगे।

सीजीनेट ने लगाया वॉयस बुक सेटअप

इसके अलावा आदिवासियों की समस्याओं को सुनने और उसके निराकरण के लिए “बुल्टू रेडियो’ और गोंडी मानक शब्दकोश मोबाइल एप जैसी पहल भी जा चुकी। “बुल्टू रेडियो’ के तहत एक प्रकार के रेडियो सेंटर या वॉयस बुक का सेटअप रायपुर में लगाया है। इसमें नंबर दिए हैं जिन पर कॉल करने पर वो अपनी बात रिकॉर्ड करा सकता है।

गोंडी का मानकीकरण

आज छत्तीसगढ़ सरकार गोंडी में कांकेर के लिए अलग और दंतेवाड़ा के लिए अलग किताब निकालती है। क्याेंकि दोनों जगह गोंडी अलग तरह से बाेली जाती है। इसलिए गोंडी के स्टैंडर्डाइजेशन का प्रोसेस 2014 में शुरू किया गया। 2018 मार्च में हमने इसमें 3 हजार शब्द शामिल किए गए हैं। इस मानक शब्दकोश के जरिए मशीन ट्रांसलेशन का काम शुरू किया गया।

1.02 करोड़ लोग बोलते हैं गोंडी

2011 की जनगणना के मुताबिक 1.02  करोड़ लोग गोंडी बोलते हैं । नक्सल इलाकों में इनकी संख्या ज्यादा है। इनके और हिंदीभाषियों के बीच पुल बनाने की जरूरत है। सीजीनेट, माइक्रोसॉफ्ट रिसर्च और ट्रिपल आईटी नया रायपुर मिलकर एक ऐसा मशीन ट्रांसलेशन टूल बना रहे हैं, जिसके माध्यम से गोंडी का हिंदी और हिंदी का गोंडी में आसानी से अनुवाद किया जा सके।

भाषा की दिक्कत के कारण आदिवासियों के करीब न पहुंच पा रहे प्रशासन की समस्या हल करने के लिए निकट भविष्य में एक टूल अाने वाला है। इसके जरिए अफसरों की हिंदी में कही गई बात आदिवासी गोंडी में सुन पाएंगे और उनकी गोंडी में कही बात अफसरों को हिंदी में सुनाई देगी। इस टूल से फोर्स को भी आदिवासियाें का विश्वास जीतने और नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति बहाल करने में मदद मिलेगी।

शुभ्रांशु ने बताया कि हमारा मुख्य उद्देश्य गोंडी का मानकीकरण है। इसके लिए अभी 20 बच्चे बस्तर से आए हैं। कुछ बच्चे महाराष्ट्र से हैं और कुछ मध्यप्रदेश के हैं। प्रथम बुक्स नाम से एक संस्था जो बच्चों की किताबों पर काम करती है, उन्होंने हमें 400 किताबें दी पहली से लेकर चौथी तक के बच्चों के लिए दी हैं। इन्हें हम ड्राॅप आउट बच्चों के लिए गोंडी में तैयार कर रहे हैं।

ट्रांसलेटर के लिए 10 हजार वाक्यों का अनुवाद हुआ

अगले साल की शुरुअात तक ये मशीन तैयार होने की संभावना है। प्रथम बुक्स की अमना सिंह ने हिंदी से गाेंडी में किताबों को अनुवाद करने के लिए ट्रिपल आईटी कैंपस में दस दिनों की कार्यशाला पिछले दिनों की थी। इससे दो चीजें हुई एक तो मानक गोंडी में कई किताबों का अनुवाद हो गया। दूसरा सीजी नेट को जो शुरुअाती दस हजार वाक्यों का हिंदी से गोंडी में अनुवाद चाहिए था, उसमें मदद मिल गई।



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