बस्तरियों को दिया धोखा, बना रहे गुलाम-15 सालों में रमनसिंह सरकार ने किया न कोई काम: कांग्रेस - गोंडवाना एक्सप्रेस
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बस्तरियों को दिया धोखा, बना रहे गुलाम-15 सालों में रमनसिंह सरकार ने किया न कोई काम: कांग्रेस

  • जल, जंगल, जमीन, छीने सारे अधिकार, बढ़ाया पूँजीपती मित्रों का व्यापार-ऐसी है भाजपा सरकार।
  • बस्तरियों को दिया धोखा, बना रहे गुलाम-15 सालों में रमनसिंह सरकार ने किया न कोई काम।
  • प्राकृतिक संसाधनों का किया हनन, बस्तरवासियों का क्रूरतापूर्वक दमन।

बिलासपुर (एजेंसी) | पिछले 15 सालों से भाजपा की निर्दयी रमन सिंह सरकार ने बस्तरवासियों के दमन, उत्पीड़न व अधिकारों के हनन की क्रूर कहानी लिखी है। प्रदेश की एक तिहाई से ज्यादा जनता आदिवासी है, पर निर्मम, निष्ठुर, व निठुर भाजपा सरकार ने बस्तरवासियों के अधिकार छीनने और पूंजीपति मित्रों को सौंपने के अलावा कुछ नहीं किया।
सत्ता के अहंकार व प्राकृतिक संसाधनों की लूट कर धन इकट्ठा करने की लालसा ने भाजपा सरकार को गरीब आदिवासियों के दुःख व दर्द के प्रति अँधा बना दिया है। उनकी जल, जंगल, जमीन हथिया कर, चंद उद्योगपतियों को अपार फायदा पहुंचाने में डॉ. रमनसिंह सरकार चैंपियन बन चुकी है।




छत्तीसगढ़, अकेला ऐसा राज्य है जो बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों से धनवान व खनिज पदार्थो से ओतप्रोत है। भारत का 20 प्रतिशत स्टील व सीमेंट उत्पादन छत्तीसगढ़ में ही होता है, पर कड़वी सच्चाई यह है कि भाजपा की सत्तालोलुपता ने छत्तीसगढ़ को चंद पूँजीपती मित्रों के ठेके पर दे दिया है।

कांग्रेस पैनेलिस्ट की प्रेस वार्ता के मुख्य अंश:

1. कांग्रेस-यूपीए द्वारा बनाए वन अधिकार कानून, 2007 के तहत राज्य के आदिवासियों ने फरवरी, 2017 तक 8,43,539 आवेदन व्यक्तिगत वन पट्टों के लिए दिए, परंतु रमन सिंह सरकार ने 56 प्रतिशत वन पट्टे, यानि 4,69,821 सिरे से ही खारिज कर दिए।

2. केंद्र की कांग्रेस सरकार ने पहली बार देश में ‘वन उपज’ का न्यूनतम समर्थ मूल्य (MSP) तय करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। परंतु मई, 2014 के बाद पिछले 4.5 सालों में मोदी-रमन सिंह सरकारों ने वन उपज के समर्थ मूल्य को लेकर आदिवासियों पर गहरा कुठाराघात किया। चिरौंजी गुठली का न्यूनतम समर्थन मूल्य साल 2014-15 में 100 रु. प्रतिकिलो था। साल 2017-18 में मोदी-रमनसिंह सरकारों ने उसे कम कर 93 रु. प्रतिकिलो कर दिया। साल 2014-15 में महुआ बीज का न्यूनतम समर्थन मूल्य 22 रु. प्रतिकिलो था। साल 2017-18 में उसे घटाकर 20 रु. किलो कर दिया गया। साल 2014-15 में कुसुमी लाख का न्यूनतम समर्थन मूल्य 320 रु. किलो था। साल 2017-18 में इसे कम कर 150 रु. किलो कर दिया गया। साल 2014-15 में रंगीनी लाख का न्यूनतम समर्थन मूल्य 230 रु. प्रतिकिलो था, जो 2017-18 में घटाकर 100 रु. किलो कर दिया गया। साल, 2014-15 में हर्रा का न्यूनतम समर्थन मूल्य 11 रु. किलो था, जो 2017-18 में घटाकर 8 रु. किलो कर दिया गया। इसी प्रकार साल, 2014-15 में इमली का न्यूनतम समर्थन मूल्य 22 रु. किलो था, जो 2017 में घटाकर 18 रु. किलो कर दिया गया। अब जब सरकार जाने वाली है, तो उसे पुनः 22 रु. किलो निर्धारित किया गया है। साल 2014-15 में साल बीज का न्यूनतम समर्थन मूल्य 10 रु. किलो था। इसमें चार साल तक कोई बढ़ोत्तरी नहीं की गई। अब सरकार जाते देख मात्र 2 रु. की बढ़ोत्तरी की गई है। इसका विवरण A1 में संलग्न है।

3. पहले तो 56 प्रतिशत आदिवासी वन पट्टे सिरे से ही खारिज कर दिए गए। जो आदिवासी वन पट्टे मिले भी, चोर दरवाजे से रमन सिंह सरकार ने उन्हें भी खुर्द-बुर्द करने का षडयंत्र कर डाला।

मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू कानून 1959 की धारा 165 (6) के तहत ‘शेड्यूल्ड एरिया’ (आदिवासियों के लिए चिन्हित एरिया) के अंदर आदिवासियों कर जमीन को किसी प्रकार से हस्तानांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध है।
नॉन शेड्यूल्ड एरिया में भी आदिवासियों की जमीन के हस्तानांतरण पर बगैर कलेक्टर की लिखित अनुमति के प्रतिबंध है और वो भी जमीन हस्तानांतरण का कारण बाकायदा रिकॉर्ड किए जाने की शर्त पर।
चुनिंदा उद्योगपतियों के हाथ आदिवासियों की जमीन लुटवाने के लिए रमन सिंह सरकार ने इस कानून को ही रद्दी की टोकरी में डाल दिया तथा 17 अगस्त, 2016 को एक आदेश निकाल आदिवासी पट्टों को गैरकानूनी तरीके से इस कानून की परिधि से बाहर कर दिया। 17 अगस्त, 2016 के आदेश की प्रतिलिपि A2 संलग्न है। नतीजा यह है कि भोलेभाले गरीब आदिवासियों की जमीन रमन सिंह सरकार के उद्योगपति मित्र कानून और संविधान की अवहेलना में लूटे जा रहे हैं।




4. हद तो तब हो गई, जब संविधान व कानून में दिए आदिवासियों की ज़मीन की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध को खत्म करने हेतु रमन सिंह सरकार ने छत्तीसगढ़ लैंड रेवेन्यू (संशोधन कानून), 2017 जबरन विधानसभा में पारित कर डाला। आदिवासियों व कांग्रेस पार्टी के विरोध के बाद राज्यपाल ने इस कानून को संविधान संगत न होने की वजह से सरकार को पुर्नविचार हेतु वापस लौटा दिया। राज्यपाल के आदेश 7 फरवरी, 2018 की प्रति A3 संलग्न है।
षडयंत्रकारी रमन सिंह सरकार ने अब भी इस कानून को निरस्त नहीं किया व मौका पाते ही इस साजिश को दोबारा लागू करने की ताक में हैं, ताकि आदिवासी अधिकारों को सदैव के लिए छत्तीसगढ़ से खत्म किया जा सके। इस साजिश का वोट की चोट से जवाब देने का समय आ गया है।

5. विगत 15 वर्षो में राज्य में 90,000 एकड़ से भी अधिक भूमि कृषकों से छीनकर उद्योगपतियों को अंतरित की गयी।उनमें से अधिकांश भूमि आदिवासियों (अनुसूचित जनजाति के सदस्यों) की है। ये भूमि स्टील, सीमेंट, पावर उद्योगों की स्थापना एवं कोयले तथा लौह अयस्क (आयरन ओर) की खनन (Mining) परियोजना के क्रियान्वयन में गयी है।

6. रमनसिंह सरकार का आदिवासी विरोधी रवैया इससे भी साबित होता है कि खनन आदि परियोजनाएं लगाने वाली निजी कंपनियों को लैंड सीलिंग कानून से पूरी तरह छूट दे दी गई है। यह बात सरकार के विधानसभा में दिए जवाब दिनांक 12 फरवरी, 2018 से साबित हो जाती है, जिसकी कॉपी A4 संलग्न है। आज भी 50,000 एकड़ से अधिक जमीन भिन्न-भिन्न उद्योगों के पास बगैर इस्तेमाल के पड़ी है। क्या यह सीधे-सीधे लैंड सीलिंग कानून का उल्लंघन नहीं?

7. केंद्र की मोदी सरकार का आदिवासी विरोधी रवैया तो और ज्यादा मुखर है। मोदी सरकार ने आदिवासी कल्याण की 307 योजनाओं को घटाकर 261 कर दिया। आदिवासी कल्याण के लिए आवंटित पैसा भी एक षडयंत्रकारी तरीके से खत्म किया जा रहा है। साल 2017-18 में आदिवासी कल्याण के लिए बजट में 31,920 करोड़ रु. आवंटित किए, परंतु खर्च किए मात्र 18073 करोड़। यह भाजपा की आदिवासी विरोधी मानसिकता का जीता जागता सबूत है।

8. छत्तीसगढ़ के बस्तर, दांतेवाड़ा, बीजापुर, कांकेर, सुखमा आदि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर जिलों में भाजपा सरकार की नाकामी की हालत तो यह है कि 15 साल के भाजपाई शासन के बाद मूलभूत अस्पताल सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं। आज भी इलाज करवाने के लिए रायपुर जाना अनिवार्य है। कोई बीमार हो, दुर्घटना हो या फिर नक्सल हमले में घायल फौजी जवान, हर व्यक्ति को इलाज के लिए रायपुर ले जाना अपनेआप में भाजपा की विफलता जगजाहिर करता है।

9. रमनसिंह सरकार की नाकामी का इससे बड़ा सबूत क्या है कि पिछले 2 सालों में खनिज क्षेत्रीय विकास योजना में लगभग 3000 करोड़ रु. की राशि मिली, जो खनन से विस्थापित परिवारों के कल्याण में इस्तेमाल होनी थी, जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, पेयजल इत्यादि। परंतु इस सारे पैसे को डाइवर्ट कर दिया गया, जिससे विस्थापित परिवारों को कोई लाभ नहीं हुआ।

अब समय आ गया है कि जल, जंगल, जमीन के मालिक आदिवासी व उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले छत्तीसगढ़ के निवासी भाजपाई सरकार को वोट की चोट से उखाड़ फेंकें।



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