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#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से छह किलोमीटर दूर मालीघोरी खपरी गांव में “कुकुरदेव” नाम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि कुत्ते को समर्पित है, हालांकि साथ में शिवलिंग आदि प्रतिमाएं स्तिथ है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है और उसके बगल में एक शिवलिंग भी है। कुकुर देव मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुत्ते (कुकुरदेव) की वैसे ही पूजा करते हैं जैसे शिवमंदिरों में नंदी की पूजा होती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); यह मंदिर दरअस
#temple 6 महीने में बना था देवबलोदा चरोदा का 6-मासी शिव मंदिर

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सघन वन वल्लारियों से आच्छादित मेकल, रामगढ़ तथा सिहावा की पर्वत श्रेणियों से सुरक्षित एवं महानदी, शिवनाथ, खारून, जोंक, हसदो आदि कई छोटी बड़ी नदियों से सिंचित छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। इन नदियों के तट और घाटियों में न जाने कितनी सभ्यताओं का उदय, विकास और अस्त कालगति के अनुसार होता रहा, जिनके अवशेष अभी भी अनेक स्थानों पर बिखरे हुए हैं और उनके प्राचीन महत्व और गौरव की महिमा का गुणगान करते नहीं अघाते हैं। ऐसा ही एक प्राचीन स्थल दुर्ग के पास है- देव बलोदा। प्राचीनकाल में देव मंदिरों के लिए प्रसाद शब्द का प्रयोग किया जाता था। प्रसाद का अर्थ होता है वह स्थल जहां मन प्रसन्न हो। जिनकी रमणीयता से देवताओं और मनुष्यों के मन प्रसन्न होते हैं- वे प्रसाद है। इसीलिए प्रसाद या देवमंदिरों के निर्माण के लिए सुरम्य स्थलों का चुनाव किया जाता था। वराहमिहिर लिखते हैं कि वन,
#temple चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता का मुख है चंद्र की तरह

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माता सती के अंग जहां-जहां धरती पर गिरे थे, वहां आज वर्तमान में शक्ति माता श्री दुर्गा के शक्तिपीठ स्थापित हैं।छत्तीसगढ़ में भी अनेक स्थानों माता के शक्तिपीठ स्थापित है। जिनमे से एक माता चंद्रहासिनी का मंदिर है। जांजगीर-चाम्पा जिले के डभरा तहसील में मांड नदी,लात नदी और महानदी के संगम पर स्थित है एक गांव चन्द्रपुर, जहाँ शक्ति माँ चंद्रहासिनी देवी का मंदिर है। यहाँ सिद्ध मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है। चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी या चंद्रासैनी मां के नाम से जानी जाती है। चंद्रपुर जिला मुख्यालय जांजगीर-चाम्पा से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर और सारंगढ़ से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां माता चंद्रसेनी का वास है। वहाँ कुछ ही दुर (लगभग 1.5कि.मी.) पर माता नाथलदाई का मंदिर है ज
#temple ढोलकल के गणेश, जहाँ गिरा था भगवान गणेश का दाँत

#temple ढोलकल के गणेश, जहाँ गिरा था भगवान गणेश का दाँत

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हमारा छत्तीसगढ़ अनेक विविधताओं और रहस्यों से भरा है। जहां धर्म, आस्था और रोमांच का संगम कई स्थानों में एक साथ देखने को मिलता है। ऐसी ही एक जगह है ढोलकल जहां धरती के प्रथम पूज्य देव भगवान गणेश की अद्भुत प्रतिमा स्थित है। प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगभग 395 किमी दूर प्राकृतिक छटा के बीच दक्षिण बस्तर के जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से 30 किलोमीटर दूर बैलाडीला की 3000 फीट ऊंची बहुत ही दुर्गम फरसपाल पहाड़ी पर सैकड़ों साल पुरानी, नागवंशीय राजाओं द्वारा स्थापित है भगवान ढोलकल गणेश जी की प्रतिमा। भगवान गणेश जी की यह भव्य प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से भी अत्यन्त कलात्मक है जो 6 फीट ऊंची ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। ऊपरी दाएं हाथ में फरसा, ऊपरी बाएं हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे दाएं हाथ में अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा नीचे बाएं हाथ में मोदक धारण किए हुए आयुध के रूप में विराजित है यह अ
#temple बागबाहरा में माता के इस दरबार में भालू भी आते है प्रसाद लेने

#temple बागबाहरा में माता के इस दरबार में भालू भी आते है प्रसाद लेने

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यहाँ पर माता की जैसे आरती की घंटी बजती है माता के दरबार में भालू प्रसाद के लिए आते है, इन भालुओ ने आज तक किसी को कोई नुकसान नही पहुचाया है इसे माता का चमत्कार भी कहा जाता है। बागबाहरा | चंडी माता मन्दिर महासमुंद जिला अंतर्गत ग्राम बागबाहरा के समीप घुंचापाली में स्थित है। ग्राम बागबाहरा चारो ओर प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। चारो ओर से जंगलो और पहाड़िओ से घिरे ग्राम में विराजमान है स्वयंभू माँ चंडी। माता चंडी रूप देखते ही बनता है लगभग 9 फ़ीट ऊंची माँ की विशालकाय भूगर्भित प्रतिमा जो निरंतर बढ़ रही है, स्वयं में अद्वितीय है। मंदिर पहाड़ी के ऊपर स्थित है माँ चंडी का मंदिर जिला महासमुंद से 38 km की दुरी पर स्थित है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); पहाड़ी पर चढ़ने हेतु सीढ़ियों की कोई आवश्यकता नहीं है लंबे ढलान के होने से चढ़ाई अत्यंत सुगम हो जाती है अतः बुजुर्गो
#temple मनमोहक है बालोद का सिया देवी मंदिर और वॉटरफॉल

#temple मनमोहक है बालोद का सिया देवी मंदिर और वॉटरफॉल

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छत्तीसगढ़ अंचल में दुर्ग संभाग के बालोद जिले, गुरुर तहसील से धमतरी मार्ग में ग्राम सांकरा (बालोद से 25 कि. मी. दूर ) से दक्षिण की ओर 7 कि. मी. कि दूरी पर देव स्थल ग्राम नारागांव स्थित हैं। शक्ति और सौन्दर्य का अनोखा संगम अपने अप्रतिम प्राक्रतिक सौन्दर्य से पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। सिया देवी झरना दंडकारण्य पर्वत से प्रारंभ होकर झलमला से होते हुए वन मार्ग में 17 कि.मी. की दुरी तय करती हैं। प्राक्रतिक जल प्रपात एवं गुफ़ाओ से आच्छादित नारागांव स्थित सियादेवी, आध्यात्मिक एवं पर्यटक स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। वनाच्छादित यह पहाड़ी स्थल प्राक्रतिक जल स्त्रोतो के कारण और भी मनोहारी दिखाई पड़ता हैं। इस पहाड़ी पर दो स्थानों से जल स्त्रोतों का उद्गम हुआ हैं। पूर्व दक्षिण से आने वाला झोलबाहरा और दक्षिण पश्चिम से आने वाला तुमनाला का संगम देखते ही बनता हैं। (adsbygoogle = window.ads