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नवरात्रि विशेष : चंडी माता मंदिर, बागबाहरा के दरबार में भालू भी रोज आते है प्रसाद लेने

नवरात्रि विशेष : चंडी माता मंदिर, बागबाहरा के दरबार में भालू भी रोज आते है प्रसाद लेने

tourism, छत्तीसगढ़
यहाँ पर माता की जैसे आरती की घंटी बजती है माता के दरबार में भालू प्रसाद के लिए आते है, इन भालुओ ने आज तक किसी को कोई नुकसान नही पहुचाया है इसे माता का चमत्कार भी कहा जाता है। बागबाहरा | चंडी माता मन्दिर महासमुंद जिला अंतर्गत ग्राम बागबाहरा के समीप घुंचापाली में स्थित है। ग्राम बागबाहरा चारो ओर प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। चारो ओर से जंगलो और पहाड़िओ से घिरे ग्राम में विराजमान है स्वयंभू माँ चंडी। माता चंडी रूप देखते ही बनता है लगभग 9 फ़ीट ऊंची माँ की विशालकाय भूगर्भित प्रतिमा जो निरंतर बढ़ रही है, स्वयं में अद्वितीय है। मंदिर पहाड़ी के ऊपर स्थित है माँ चंडी का मंदिर जिला महासमुंद से 38 km की दुरी पर स्थित है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); पहाड़ी पर चढ़ने हेतु सीढ़ियों की कोई आवश्यकता नहीं है लंबे ढलान के होने से चढ़ाई अत्यंत सुगम हो जाती है अतः बुजुर्गो
नवरात्रि विशेष: जानिए दंतेवाड़ा की माँ दंतेश्वरी के बारे में, जहाँ गिरे थे माता सती के दाँत

नवरात्रि विशेष: जानिए दंतेवाड़ा की माँ दंतेश्वरी के बारे में, जहाँ गिरे थे माता सती के दाँत

tourism, video, छत्तीसगढ़
दन्तेश्वरी मंदिर जगदलपुर शहर से लगभग 84 किमी (52 मील) स्थित है। माता दंतेश्वरी का यह मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध एवं पवित्र मंदिर है, यह माँ शक्ति का अवतार है। माना जाता है कि इस मंदिर में कई दिव्य शक्तियां हैं। दशहरा के दौरान हर साल देवी की आराधना करने के लिए आसपास के गांवों और जंगलों से हजारों आदिवासी आते हैं। यह मंदिर जगदलपुर के दक्षिण-पश्चिम में दंतेवाड़ा में स्थित है और यह पवित्र नदियां शंकिणी और डंकिनी के संगम पर स्थित है, यह छह सौ वर्ष पुराना मंदिर भारत की प्राचीन विरासत स्थलों में से एक है और यह मंदिर बस्तर क्षेत्र का सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक का प्रतिनिधित्व है। आज का विशाल मंदिर परिसर इतिहास और परंपरा की सदियों से वास्तव में खड़ा स्मारक है। इसके समृद्ध वास्तुशिल्प और मूर्तिकला और इसके जीवंत उत्सव परंपराओं का प्रमाण है। दंतेश्वरी माई मंदिर इस क्षेत्र के लोगों के लिए सबसे महत्वप
नवरात्रि विशेष: जानिए चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता के बारे में जिनका मुख है चंद्र की तरह

नवरात्रि विशेष: जानिए चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता के बारे में जिनका मुख है चंद्र की तरह

tourism, video, छत्तीसगढ़
माता सती के अंग जहां-जहां धरती पर गिरे थे, वहां आज वर्तमान में शक्ति माता श्री दुर्गा के शक्तिपीठ स्थापित हैं।छत्तीसगढ़ में भी अनेक स्थानों माता के शक्तिपीठ स्थापित है। जिनमे से एक माता चंद्रहासिनी का मंदिर है। जांजगीर-चाम्पा जिले के डभरा तहसील में मांड नदी,लात नदी और महानदी के संगम पर स्थित है एक गांव चन्द्रपुर, जहाँ शक्ति माँ चंद्रहासिनी देवी का मंदिर है। यहाँ सिद्ध मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है। चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी या चंद्रासैनी मां के नाम से जानी जाती है। चंद्रपुर जिला मुख्यालय जांजगीर-चाम्पा से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर और सारंगढ़ से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां माता चंद्रसेनी का वास है। वहाँ कुछ ही दुर (लगभग 1.5कि.मी.) पर माता नाथलदाई का मंदिर है ज
नवरात्रि विशेष : माँ बम्लेश्वरी माता मंदिर डोंगरगढ़, राजनांदगाव के बारे में जानिए

नवरात्रि विशेष : माँ बम्लेश्वरी माता मंदिर डोंगरगढ़, राजनांदगाव के बारे में जानिए

tourism, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित है मां बम्लेश्वरी का भव्य मंदिर। पहाड़ों से घिरे होने के कारण इसे पहले डोंगरी और अब डोंगरगढ़ के नाम से जाना जाता है। यहां ऊंची चोटी पर विराजित बगलामुखी मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर। छत्तीसगढ़ ही नहीं देश भर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। हजार से ज्यादा सीढिय़ां चढ़कर हर दिन मां के दर्शन के लिए वैसे तो देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आते हैं लेकिन नवरात्रि के दौरान अलग ही दृश्य होता है। जो ऊपर नहीं चढ़ पाते उनके लिए मां का एक मंदिर पहाड़ी के नीचे भी है जिसे छोटी बम्लेश्वरी मां के रूप में पूजा जाता है। अब मां के मंदिर में जाने के लिए रोप वे भी लगाया गया है। मंदिर का इतिहास लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व इसे कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। यहाँ राजा वीरसेन का शासन था। वे नि:संतान थे। संतान की कामना के लिए उन
#waterfall जशपुर के घने जंगलों के बीच में है राजपुरी वाटरफॉल्स

#waterfall जशपुर के घने जंगलों के बीच में है राजपुरी वाटरफॉल्स

tourism, video, छत्तीसगढ़
जशपुर जिले में घने जंगलो के बीच में राजपुरी जलप्रपात जिले के उन स्थानों में से एक है जहां लोग सबसे ज्यादा घूमने जाते है। साथ ही यह एक लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट है। यहाँ आसपास के आदिवासी गांव एक अलग ही आकर्षण का केंद्र हैं पहाड़ी के दोनों किनारों पर चट्टानी दीवार और हरे जंगलो को देख बहुत शांति और सुखद अनुभव लगता है। जशपुर में कई अन्य स्थानों की तरह, यहां भी कहने के लिए बहुत दिलचस्प कहानियां हैं और कई लोकप्रिय लोककथाएं भी है सुनने के लिए। यह जगह जशपुर मुख्य शहर से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वीडियो देखे https://youtu.be/uuu4AZN54Gs राजपुरी झरना तक कैसे पहुंचे सड़क मार्ग से: जशपुर अच्छी तरह से सड़कों और राजमार्गों के एक अच्छे नेटवर्क द्वारा छत्तीसगढ़ के प्रमुख और छोटे शहरों से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग 78 (NH-78) जशपुर से गुजरता है। ट्रेन से: निकटतम रेलवे स्टेशन अंबिकापुर र
#culture बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व है पोला, जानिए पूजन विधि, महत्व और पौराणिक कथा

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किसी भी राज्य की सार्थक पहचान उनकी संस्कृति से होती है। जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य भारत देश का एक मात्र ऐसा राज्य है जो पूर्णतः कृषि कार्य प्रधान राज्य है। यहाँ के निवासी पूरे वर्ष भर खेती कार्य मे लगे रहते है। धान की खेती यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ के निवासियों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को कुछ इस तरह संजोकर रखा है, कि कृषि कार्यो के दौरान साल के विभिन्न अवसरो पर- खेती कार्य आरंभ होने के पहले अक्ती, फसल बोने के समय सवनाही, उगने के समय एतवारी-भोजली, फसल लहलहाने के समय हरियाली, आदि आदि अवसरो व ऋतु परिवर्तन के समय को धार्मिक आस्था प्रकट कर पर्व-उत्सव व त्योहार के रूप मे मनाते हुए जनमानस मे एकता का संदेश देते है। यहाँ के निवासी, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा प्रकृति को भी भगवान की ही तरह पूजा करते है। बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व-पोला पोला पर्व के अवसर पर तरह तरह के व्यंजन बनाए
#culture हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार

#culture हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार

tourism, छत्तीसगढ़
धान का कटोरा के नाम से प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ अपनी संस्कृति के साथ-साथ अनेकोनेक तीज त्योहारों के लिए भी जाना जाता है। और त्योहारों की शुरुआत होती है छत्तीसगढ़ के पहले तिहार 'हरेली' से। हरेली महोत्सव किसानों का महत्वपूर्ण त्योहार है। हरेली छत्तीसगढ़ी शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है 'हरियाली'। तब प्रकृति भी प्रचंड गर्मी के बाद हरियाली से आच्छादित हो जाती है। यह छत्तीसगढ़ के ‘गोंड‘ जनजातीय का मुख्य रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है यह त्यौहार हिंदू कैलेंडर के सावन (श्रावण) महीने के श्रावणी अमावस्या के दिन मनाया जाता है। जो जुलाई और अगस्त के बीच वर्षा ऋतु में होता है। यह त्यौहार ‘श्रावण’ के महीने के प्रारंभ को दर्शाता है जो कि हिंदुओं का पवित्र महीना है। पशुधन और किसानी में काम आने वाले औजारों की पूजा की जाती है  https://youtu.be/fw82beoVd0E यह त्योहार पूरे दिन मनाया जाता है और किसी क
खुदाई में मिली 2 हजार साल पुरानी कृष्ण-बलराम और लज्जा गाैरी मूर्ति

खुदाई में मिली 2 हजार साल पुरानी कृष्ण-बलराम और लज्जा गाैरी मूर्ति

tourism, छत्तीसगढ़
जमराव में की गई खुदाई में मिली कृष्ण-बलराम और भगवान शंकर की मूर्ति। आरंग (एजेंसी) | शहर से महज 40 किलोमीटर के दायरे में दो जगहों पर हुई खुदाई में हजारों साल पुराने अवशेष मिले हैं। संस्कृति और पुरातत्व विभाग की ओर से शहर से 30 किलोमीटर दूर महादेव घाट के आगे जमराव गांव और 40 किलोमीटर दूर आरंग रोड में रीवां गांव में उत्खनन किया जा रहा है। जमराव में लज्जा गौरी की लगभग 2 हजार साल पुरानी मूर्ति मिली है। पुरातत्वविदों के अनुसार ये खुदाई में मिली देश की पहली ऐसी मूर्ति है जिसमें माता गौरी के साथ दो शिवलिंग और एक नंदी भी हैं। इसमें माता गौरी भी एक विशिष्ट मुद्रा में हैं। यहां भगवान कृष्ण और बलराम की मूर्तियां, कई सिक्के और दीये जैसी सामग्री भी मिली है। संस्कृति विभाग के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं कोलकाता की पुरातत्वविद् डॉ. सुस्मिता बोस मजुमदार, दिल्ली के केके चक्रवर्ती और औरंगाबाद
#Temple लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, महासमुंद

#Temple लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, महासमुंद

tourism, छत्तीसगढ़
सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर भारत में पहली ईंट से निर्मित मंदिर है। सिरपुर को श्रीपुर के नाम से भी जाना जाता है इसका अर्थ है "शुभता का शहर", "बहुतायत", "लक्ष्मी"। यह छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एक गांव है और यह महानदी नदी के तट पर राजधानी रायपुर से 78 किमी दूर और महासामंद शहर से 35 किमी दूर है। सन 1872 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा ( जो कि एक औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में अधिकारी थे) सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर पर उनकी रिपोर्ट द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ध्यान में लाई गई। भारत में यह एकमात्र लक्षमण मंदिर है। 6 वीं शताब्दी के दौरान  सरभपुरियस और पाण्डुवंसिस के शासन काल में सिरपुर दक्षिण कोशल राज्य का केंद्र था। सिरपुर में और आसपास के पुरातात्विक अवशेष मंदिरों और मठों के रूप में हिन्दू और बौद्ध स्मारकों दोनों के हैं। उनमें से, सबसे अच्छी तरह से संरक्षित शानदार मंदिर, वसाता द्वारा निर्मित पूर्व
#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से छह किलोमीटर दूर मालीघोरी खपरी गांव में “कुकुरदेव” नाम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि कुत्ते को समर्पित है, हालांकि साथ में शिवलिंग आदि प्रतिमाएं स्तिथ है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है और उसके बगल में एक शिवलिंग भी है। कुकुर देव मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुत्ते (कुकुरदेव) की वैसे ही पूजा करते हैं जैसे शिवमंदिरों में नंदी की पूजा होती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); यह मंदिर दरअस