साहित्यकार अौर वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री पं. श्यामलाल चतुर्वेदी का निधन

बिलासपुर (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ के साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री पं. श्यामलाल चतुर्वेदी का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। शहर के निजी अस्पताल में 93 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। पं. चतुर्वेदी को साहित्य, शिक्षा और पत्रकार में उल्लेखनीय योगदान के लिए इसी वर्ष 3 अप्रैल को राष्ट्रपति भवन  हुए समारोह में पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित किया गया था।

मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। पद्मश्री से सम्मानित चतुर्वेदी छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे। उनका निधन अपने गृहनगर बिलासपुर के निजी अस्पताल में हुआ।




मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि पण्डित श्यामलाल चतुर्वेदी के निधन से छत्तीसगढ़ में साहित्य और पत्रकारिता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया। मुख्यमंत्री ने उनके शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना प्रकट की है और आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की है। पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसी वर्ष तीन अप्रैल को राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री से सम्मानित किया था।

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयाेग के पहले चेयरमैन से थे पंडित जी

पं. श्यामलाल चतुर्वेदी का जन्म 1926 में बिलासपुर जिले के कोटमी गांव में हुआ था। लंबे समय तक उन्होंने छत्तीसगढ़ के बड़े समाचार पत्रों के लिए लेखन किया और पत्रकारिता जगत से जुड़े रहे। बाद में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के गठन के साथ ही उन्हें पहला चेयरमैन बनाकर इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

पं. चतुर्वेदी की कहानी संग्रह ‘भोलवा भोलाराम’ को काफी सराहना मिली। वे छत्तीसगढ़ी के गीतकार भी रहे। उनकी रचनाओं में ‘बेटी के बिदा’ प्रसिद्ध है। उन्हें ‘बेटी के बिदा’ के कवि के रूप में लोग पहचानते हैं। बताया जाता है बचपन में मां के कारण उनका रुझान लेखन में हुआ। उनकी मां ने उन्हें सुन्दरलाल शर्मा की ‘दानलीला’ रटा दी थी।

1940-41 से पं. श्यामलाल चतुर्वेदी ने  लेखन आरंभ किया। शुरूआत हिन्दी में की लेकिन ‘विप्र’ जी की प्रेरणा से छत्तीसगढ़ी में लेखन शुरू किया। चतुर्वेदी शिक्षक भी थे। श्यामलाल चतुर्वेदी करीब 75 वर्षों तक साहित्य साधना के जरिए हिंदी और छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध बनाने की कोशिश करते रहे।

उन्होंने पत्रकारिता और शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी मूल्यवान सेवाएं दी हैं। वे मूलरूप से तत्कालीन अविभाजित बिलासपुर जिले के ग्राम कोटमी सोनार (वर्तमान में जिला जांजगीर-चांपा) के निवासी है, लेकिन साहित्यकार और पत्रकार के रूप में बिलासपुर उनकी कर्मभूमि रही।



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