वनभूमि बेदखली मामला: तीर-धनुष और टंगिया लेकर सड़क पर उतरे नाराज आदिवासी - गोंडवाना एक्सप्रेस
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वनभूमि बेदखली मामला: तीर-धनुष और टंगिया लेकर सड़क पर उतरे नाराज आदिवासी

जगदलपुर (एजेंसी) | 21 राज्यों के 10 लाख से ज्यादा आदिवासी परिवारों को वन भूमि में काबिज होने संबंधी दस्तावेज नहीं दिखाने के चलते उन्हें बेदखल करने के मुद्दे पर सर्व आदिवासी समाज ने नाराजगी जताई है। शुक्रवार को सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले शहर में आदिवासियों ने रैली निकाली।

सर्व आदिवासी समाज के लोग हाता मैदान में जमा हुए, जहां उन्होंने विरोध में नारेबाजी की। इसके साथ ही शहर में रैली निकालने के बाद सभी वापस हाता मैदान पहुंचे। आदिवासियों में खासा रोष देखा जा रहा है। रैली के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए। अधिकांश लोग अपने पारंपरिक हथियार टंगिया, तीर-धनुष, बंडा लेकर इसे लहराते हुए चलते रहे। वहीं नारेबाजी करने के दौरान भी उनके विरोध के दौरान हथियारों को लगातार लहराते रहे।। ऐसे ही वे कलेक्टोरेट परिसर में भी दाखिल हुए।

चेतावनी… लोग बोले- करेंगे लोकसभा चुनाव का बहिष्कार

रैली के दौरान जहां आदिवासी अपने साथ पारंपरिक हथियार टंगिया, तीर-धनुष, बंडा लेकर शामिल हुए, वहीं एसडीएम चंद्रकांत वर्मा को राष्ट्रपति के नाम सौंपे गए ज्ञापन में उन्होंने आदिवासियों के वोटर आईडी कार्ड वापस करने और लोकसभा चुनाव का बहिष्कार करने की चेतावनी दी है। इसके साथ ही भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 की धारा 7 सी का हवाला देकर उन्होंने अपना शासन काबिज करने की बात भी कही है।

दंतेवाड़ा में आज, सुकमा में कल और बीजापुर में 5 को किया जाएगा विरोध

सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने बताया कि जिन आवेदकों के पास पट्‌टा नहीं है, उन्हें जंगल से बेदखल करने के विषय पर अमल के बाद बस्तर के करीब 1 लाख 15 हजार आदिवासी प्रभावित होंगे।

इस फैसले को लेकर आदिवासी समाज ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दिया है। वहीं इसे लेकर कल 2 मार्च को दंतेवाड़ा, 4 को सुकमा और 5 मार्च को बीजापुर जिला मुख्यालय में भी विरोध प्रदर्शन करने की बात कही है।  वहीं नारेबाजी करने के दौरान भी उनके विरोध के दौरान हथियारों को लगातार लहराते हुए। ऐसे ही वे कलेक्टोरेट परिसर में भी दाखिल हुए।

कॉरपोरेट घरानों को आदिवासियों की वनभूमि देने की साजिश कर रही केंद्र: राज्य सरकार

आदिवासियों ने आरोप लगाते कहा है कि केंद्र सरकार कॉरपोरेट घरानों को वनभूमि देने की तैयारी कर रही हैं। जबकि वन अधिकार कानून 2006 के तहत भू-सुधार कार्यक्रम का पूरा अधिकार ग्रामसभा को दिया गया है।

इस मामले में केंद्र सरकार की तरफ से पैरवी करने वाले अधिवक्ता ही चुप्पी साधे बैठे रहे। वहीं वन अधिकार कानून को कमजोर करने वन मंत्रालय माइनिंग, भू-अर्जन कानून में संशोधन करने या बदलने की कोशिश करते रहे हैं। वन अधिकार कानून का कार्यान्वयन की जिम्मेदारी जनजातीय मंत्रालय की होती है। लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें वन महकमे को इसकी अगुवाई की जिम्मेदारी दे दी है।  जिससे इसकी धारा 4(5) के तहत इन्हें माइनिंग कंपनियों को दिया जा रहा है।

मामले को दोबारा खोलने और पांच जजों को नियुक्त करने मांग

राष्ट्रपति के नाम सौंपे गए ज्ञापन में उन्होंने कहा है कि आदिवासियों के अधिकारों का हनन किया गया है। इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947, भारत शासन अधिनियम 1935 और फॉरेन जुरिस्डिक्शन एक्ट 1947 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 372 (1) के तहत अभी भी आदिवासी वनभूमि में रहने के लिए वैध हैं। उन्होंने कहा कि आज भी भारत की सरकार अनुसूचित जन जाति के खिलाफ काम कर रही हैं।

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