#culture 600 वर्ष पुराना बस्तर दशहरा विश्व का सबसे लम्बा चलने वाला पर्व है, 75 दिनों तक मनाया जाता है

बस्तर का दशहरा अपनी अभूतपूर्व परंपरा व संस्कृति की वजह से विश्व प्रसिद्ध है। यह कोई आम पर्व नहीं है यह विश्व का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला पर्व है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा 75 दिन तक मनाया जाता है। बस्तरवासी वगभग 600 साल से यह पर्व मनाते आ रहे हैं। बस्तर ही एकमात्र जगह है जहां दशहरे पर रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। यह पर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा हुआ है।




बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई। प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के लिए परगनिया माझी अपने अपने परगनों से सामग्री जुटाने का प्रयत्न करते थे। सामग्री जुटाने का काम दो तीन महीने पहले से होने लगता था। इसके लिए प्रत्येक तहसील का तहसीलदार सर्वप्रथम बिसाहा पैसा बाँट देता था, जिससे गाँव-गाँव से बकरे सुअर भैंसे चावल दाल तेल नमक मिर्च आदि बड़ी आसानी से जुटा लिए जाते थे। सामग्री के औपचारिक मूल्य को बिसाहा पैसा कहते थे। एकत्रिक सामग्री मंगनी चारडरदसराहा बोकड़ा कहलाती थी। सारी सहयोग सामग्री जगदलपुर स्थित कोठी के कोठिया को सौंप दी जाती थी।

आज का बस्तर दशहरा पूर्णतः दंतेश्वरी का दशहरा है। बस्तर दशहरे की यह एक तंत्रीय पर्व प्रणाली आज के बदलते जीवन मूल्यों में भी दर्शकों को आकर्षित करती चल रही है। यह इसकी एक बड़ी बात है। कहना न होगा आज का जो बस्तर दशहरा हम देख रहे हैं। वह हमें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ता है। एक ऐसा अतीत जो बस्तर के आदिवासियों की अमूल्य धरोहर है ।

600 साल पुराना त्यौहार है

बस्तर दशहरा की शुरूआत 1408 ई में बस्तर के काकतीय चालुक्य राजा पुरूषोत्तम देव के शासन काल में हुई थी। एक अनुश्रुुति के अनुसार बस्तर नरेश भैराजदेव के पुत्र पुरुषोत्तम देव ने जगन्नाथपुरी तक पदयात्रा कर मंदिर में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ, स्वर्णाभूषण अर्पित की थी। स्वप्न में श्री जगन्नाथ ने राजा पुरुषोत्तम देव को रथपति घोषित करने के लिए पुजारी को आदेश दिया था। राजा पुरुषोत्तम देव जब पुरी धाम से बस्तर लौटे तभी से गोंचा और दशहरा पर्व पर रथ चलाने की प्रथा चल पड़ी। 75 दिनो तक दशहरा की इस लंबी अवधि में पाटजात्रा, काछन गादी, जोगी बिठाई, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी तथा मुरिया दरबार मुख्य रस्में होती हैं।

वहीं बस्तर दशहरा में काछिनगादी की रस्म महाराज दलपत देव 1721 से 1775 ई के समय प्रारंभ मानी जाती है। जगदलपुर मे पहले जगतु माहरा का कबीला रहता था जिसके कारण यह जगतुगुड़ा कहलाता था। जगतू माहरा ने हिंसक जानवरों से रक्षा के लिये बस्तर महाराज दलपतदेव से मदद मांगी। दलपतदेव को जगतुगुड़ा भा गया उसके बाद दलपत देव ने जगतुगुड़ा में ही बस्तर की राजधानी स्थानांतरित की। जगतु माहरा और दलपतदेव के नाम पर यह राजधानी जगदलपुर कहलाई। दलपतदेव ने जगतु माहरा की ईष्ट देवी काछिनदेवी की पूजा अर्चना कर दशहरा प्रारंभ करने की अनुमति मांगने की परंपरा प्रारंभ की तब से अब तक प्रतिवर्ष बस्तर महाराजा के द्वारा दशहरा से पहले आश्विन अमावस्या को काछिन देवी की अनुमति से ही दशहरा प्रारंभ करने की प्रथा चली आ रही है।

राम-रावण का नहीं दंतेश्वरी देवी का पर्व है बस्तर दशहरा 

मान्यता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के लगभग दस साल दंडकारण्य में बिताए थे। छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका प्राचीन समय में दंडकारण्य के रूप में जाना जाता था। लेकिन फिर भी यहां का ऐतिहासिक दशहरा राम की लंका विजय के लिए नहीं मनाया जाता है। दशहरे में बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की की विशेष पूजा की जाती है। उनके लिए यहां एक भव्य रथ तैयार किया जाता है, इस रथ में उनका छत्र रखकर नवरात्रि के दौरान भ्रमण के लिए निकाला जाता है।

हरियाली अमावस्या के दिन पाट जात्रा रस्म से शुरू होती है तैयारी

बस्तर दशहरे की शुरुआत श्रावण (सावन) के महीने में पड़ने वाली हरियाली अमावस्या से होती है। इस दिन रथ बनाने के लिए जंगल से पहली लकड़ी लाई जाती है। इस रस्म को पाट जात्रा कहा जाता है। रथ निर्माण के लिए प्रथम लकड़़ी का पट्ट विधिवत काटकर जंगल से लाया जाता है, इसे पाट जात्रा विधान कहा जाता है। पट्ट पूजा से पर्व के महाविधान शुरू होता है।




पाटजात्रा के बाद डेरी गड़ाई एक प्रमुख रस्म है जिसमें काष्ठ रथों का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाता है। बिलोरी के ग्रामवासी सिरहासार भवन में डेरी लाकर भूमि में स्थापित करते हैं। स्तंभ रोहण की इस परंपरा को डेरी गड़ाई कहते है। इस रस्म के बाद रथ निर्माण के लिए विभिन्न गांवों से लकडिय़ां लाकर कार्य शुरू किया जाता है।

सबकी भागीदारी है अहम

दशहरे के लिए विशेष रथ तैयार किया जाता है, इस रथ को बनाने की परंपरा करीब 600 साल पुरानी है बस्तर दशहरा में विभिन्न जनजातियों और जातियों की भागीदारी शामिल है, जिनमें से प्रत्येक को एक विशिष्ट कार्य सौंपा गया है। उदाहरण के लिए, रथ के पहिये बनाने के लिए बढ़ाई बेड़ा उमरगाँव गांव से आते हैं, रथ को खींचने के लिए रस्सी करंजी जाती के आदिवासी केसरपाल और सोनबल गांवों से आते  है, छोटे रथ को कचोरापाटी और अगारवाड़ा परगना के युवाओं द्वारा खींचा जाता है; बड़े रथ को किलेपाल के बाइसन के सींग पहने हुए मारिया आदिवासियों द्वारा खींचा जाता है सभी अनुष्ठानों पर भजन गायन पोतेदार गांव के मुंडा आदिवासियों का विशेषाधिकार है। रथ का निर्माण हर साल संवरा जाति के आदिवासियों द्वारा विशेष रूप से तैयार किया जाता है। लकड़ी के रथ के निर्माण में उपयोग किए जाने वाले लोहे के कीले हमेशा लोहर, द्वारा बनाए जाते हैं। रथ को बांधने के लिए रस्सी पाजा जनजाति के सदस्य द्वारा तैयार की जाती है। रथ निर्माण की निगरानी धाकड़ जाती के आदिवासी करते है। समारोह के लिए रथ का उपयोग करने से पहले, हमेशा खाकी जाति के सदस्यों द्वारा रथ की पूजा की जाती है। रथ निस्संदेह किसी बाहरी व्यक्ति के लिए बहुत प्राचीन लगती है। जब यह 400 से अधिक मजबूत मारिया आदिवासियों द्वारा खींचा जाता है, तो एक प्रेरक शक्ति पर बल मिलता है, जो कि आदिवासी विश्वास की शक्ति है।

काछिनगादी

प्रत्येक वर्ष नवरात्रि से पूर्व आश्विन मास की अमावस्या के दिन काछिनगादी की रस्म निभाई जाती है। काछिनगादी रस्म के निर्वहन के बाद ही दस दिवसीय दशहरा की औपचारिक शुरूआत हो जाती है। काछनगादी का अर्थ होता है काछिन देवी को गद्दी देना। काछिन देवी की गद्दी कांटेदार होती है। कांटेदार झुले की गद्दी पर काछिनदेवी विराजित होती है। काछिनदेवी का रण देवी भी कहते है। काछिनदेवी बस्तर अंचल के मिरगान आदिवासियों की कुलदेवी है।

जगदलपुर में पथरागुड़ा जाने वाले मार्ग में काछिनदेवी का मंदिर बना हुआ है। इस कार्यक्रम में राजा शाम को बड़े धुमधाम के साथ काछिनदेवी के मंदिर आते है। मिरगान जाति की कुंवारी कन्या में काछिनदेवी सवार होती है। कार्यक्रम के तहत सिरहा काछिन देवी का आव्हान करता है तब उस कुंवारी कन्या पर काछिनदेवी सवार होकर आती है। काछिन देवी चढ़ जाने के बाद सिरहा उस कन्या को कांटेदार झुले में लिटाकर झुलाता है। फिर देवी की पूजा अर्चना की जाती है। काछिनदेवी से स्वीकृति मिलने पर ही बस्तर दशहरा का धुमधाम के साथ आरंभ हो जाता है।

जोगी बिठाई

आश्विन शुक्ल प्रथमा से बस्तर दशहरा नवरात्रि कार्यक्रम दंतेश्वरी देवी की पूजा से शुरू हो जाता है। इसी दिन सिरहासार में प्राचीन टाउन हॉल में जोगी बिठाई की रस्म होती है। जोगी बिठाने के लिए सिरहासार के मध्य भाग में एक आदमी के बैठने लायक एक गड्ढा बनाया जाता है। इसके अंदर हलबा जाति का एक व्यक्ति लगातार नौ दिन योगासन में बैठा रहता है। इस दौरान वह मल-मूत्र का भी त्याग नहीं करता है। जोगी बिठाई से पहले एक बकरा और 7 मांगुर मछली काटने का रिवाज था। अब बकरा नहीं काटा जाता मांगुर मछली ही काटे जाते हैं। कहा जाता है कि पहले कभी दशहरे के अवसर पर एक कोई वनवासी दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना लेकर अपने ढंग से योग साधना में बैठ गया था। तभी से बस्तर दशहरा के अंतर्गत जोगी बिठाने की प्रथा चल पड़ी है। जोगी इस बीच फलाहार तथा दुग्धाहार में रहता है।

रथ परिक्रमा

जोगी बिठाई के दूसरे दिन से फूल रथ चलना शुरू हो जाता है। चार पहिए वाला यह रथ पुष्प सज्जा प्रधान होने के कारण फूलरथ कहलाता है। इस रथ पर आरुढ होने वाले राजा के सिर पर फूलों की पगड़ी बँधी होती थी। उनके साथ देवी दंतेश्वरी का छत्र आरुढ़ रहता है। साथ में देवी का पुजारी रहता है। प्रतिदिन शाम एक निश्चित मार्ग पर रथ परिक्रमा करता हुआ राजमहल के सिंहद्वार के सामने खड़ा हो जाता है। रथ के साथ गांव-गांव से आमंत्रित देवी देवता भी चलते है। दुर्गाष्टमी को निशाजात्रा होता है। निशाजात्रा का जलूस नगर के इतवारी बाज़ार से लगे पूजा मंडप तक पहुँचता है।
पहले-पहले 12 पहियों वाला एक विशाल रथ किसी तरह चलाया जाता था। परंतु चलाने में असुविधा होने के कारण एक रथ को आठ और चार पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया गया।

बस्तर दशहरे का खास आकर्षण होता है आदिवासियों द्वारा लकड़ियों से तैयार किया गया भव्य रथ, इसे फूल रथ भी कहते है। जिसे फूलों और विशेष तरह के रंगीन कपड़ों से सजाया जाता है। इस रथ को बनाने के लिए आदिवासी पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करते हैं। बिना किसी आधुनिक तकनीक या मशीन की मदद के बना यह रथ बेहद मजबूत होता है। दशहरे में शामिल होने बस्तर क्षेत्र के कोने-कोने से आदिवासी पहुंचते हैं और रथ को खींचते हैं। रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र रखा जाता है, राजशाही के समय में बस्तर के महाराज भी रथ में सवार होते थे। जोगी बिठाई के अगले दिन से ही फूल रथ का चलना शुरू हो जाता है। दशहरे के दिन भीतर रैनी और एकादशी के दिन बाहर रैनी की रस्म निभाई जाती है।

क्योंकि जन श्रुति है कि राजा पुरुषोत्तम देव को जगन्नाथ जी ने बारह पहियों वाले रथ का वरदान दिया था। आज भी लोग श्रद्धा भक्ति से प्रेरित होकर रथों की रस्सियाँ खींचते हैं। रथ के साथ-साथ नाच गाने भी चलते रहते हैं। मुंडा लोगों के मुंडा बाजे बजा रहे होते हैं। लोक-नृत्य धमाधम चल रहा होता है। पहले बस्तर दशहरा में इस रथयात्रा के दौरान हल्बा सैनिकों का वरचस्व रहता था। आज भी उनकी भूमिका उतनी ही जीवंत एवं महत्त्वपूर्ण है। इस रथ को बन्दुक की गोलियों की सलामी दी जाती है।

जोगी उठाई मावली पर घाव

मावली पर घाव का अर्थ है देवी की स्थापना। अश्विन शुक्ल नवमीं की शाम सिरासार में समाधिस्थ जोगी को समारोह पूर्वक उठाया जाता है। जोगी को भेंट देकर सम्मानित करते हैं। इसी दिन रात में मावली परघाव होता है। दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है। मावली देवी को दंतेश्वरी का ही रूप मानते हैं। नए कपड़े में चंदन का लेप देकर एक मूर्ति बनाई जाती है। उस मूर्ति को पुष्पाच्छादित कर दिया जाता है। मावली माता निमंत्रण पाकर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने जगदलपुर पहुँचती हैं। इनकी डोली को राजा, राजगुरु और पुजारी कंधे देकर दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचाते हैं।




विजयादशमी भीतर रैनी

विजयादशमी के दिन भीतर रैनी तथा एकादशी के दिन बाहर रैनी होता है। दोनों दिन आठ पहियों वाला विशाल रथ चलता है। भीतर रैनी के दिन यह रथ अपने पूर्ववर्ती रथ की ही दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ पर झूले की व्यवस्था रहती है।
विजयदशमी की शाम को रथ के समक्ष एक भैंस की बलि दी जाती थी लेकिन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है। भैंस को महिषासुर का प्रतीक माना जाता था। इस रथ रथ के आगे अंगदेव रहते है और पीछे रथ को माता मावली की परिक्रमा कराइ जाती है। रथ को खींचने के लिए कई गांवो से लोग आते है।

रथ चोरी करने की रस्म यानि बाहिर रैनी

भीतर रैनी रस्म के साथ विजयादशमी के दिन रथ की परिक्रमा जब पूरी हो जाती है तो आदिवासी आठ पहियों वाले इस रथ को प्रथा के अनुसार चुराकर कुम्हड़ाकोट ले जाते हैं। इसका कारण है कि बस्तर दशहरे की हर रस्म के लिए आदिवासियों की अलग-अलग जनजातियों को जिम्मेदारी दी गई, इस तरह हर जनजाति इसका हिस्सा बनती है। लेकिन जब पहली बार बस्तर दशहरा मनाया गया तब माड़िया जनजाति को कोई काम नहीं दिया गया था जिससे वे नाराज हो गए और उन्होंने रथ चुरा लिया।

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अगले दिन बस्तर के महाराज को जाकर उन्हें मनाना पड़ा। राजा देवी को नया अन्न अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसे नवाखाई भी कहते है। महाराज साथ बैठकर खाना भी खाते है। खाना खाने के बाद ही रथ वापस किया गया। इसके बाद रथ चोरी भी परंपरा का हिस्सा बन गई। बाहिर रैनी का झूलेदार रथ कुम्हड़ाकोट से चलकर सिंह द्वार तक पहुंचता है। बस्तर दशहरे की शाभा यात्रा में कई ऐसे दृश्य हैं जिनके अपने अलग-अलग आकर्षण हैं और जनसे पर्याप्त लोकरंजन हो जाता है।

मुरिया दरबार

दशहरा संपन्न होने पर काछिनगुड़ी के पासवाले पूजामंडप में काछिन देवी को सम्मानित किया जाता है। शाम को सीरासार में ग्रामीण तथा शहर के मुखियों की एक मिली जुली आमसभा होती है। इसमें विभिन्न परगनाओं के मांझी-मुखिया विभिन्न समस्याओं के निराकरण पर खुली चर्चा करते हैं। इस सभा को मुरिया दरबार कहते हैं। इसी के साथ गांव-गांव से आए देवी-देवताओं की विदाई हो जाती है। बस्तर दशहरे का यह एक सार्थक कार्यक्रम था। वैसे आदिवासी दरबार आज भी चल रहा है। इसी के साथ गाँव-गाँव से आए देवी देवताओं की विदाई हो जाती है। बस्तर के वर्तमान महाराज कमलचंद्र भंजदेव हैं, अब मुरिया दरबार में महाराज के साथ-साथ राज्य के सीएम भी लोगों की समस्याएं सुनते हैं।

ओहाड़ी

अंत में प्रातः गंगा मुणा स्थित मावली शिविर के निकट बने पूजा मंडप पर मावली माई के विदा सम्मान में गंगा मुणा जात्रा संपन्न होती है। इस कार्यक्रम को ओहाड़ी कहते हैं। पहले बस्तर दशहरा के विभिन्न जात्रा कार्यक्रमों में सैकड़ों पशुमुंड कटते थे जात्रा का अर्थ होता है यात्रा अर्थात महायात्रा (बलि)। बस्तर अंचल शक्ति पूजकों का अंचल है। पर आज यह प्रथा बंद-सी हो गई है। इसी के साथ ही बस्तर दशहरे का समापन होता है।


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