#temple 6 महीने में बना था देवबलोदा चरोदा का 6-मासी शिव मंदिर

सघन वन वल्लारियों से आच्छादित मेकल, रामगढ़ तथा सिहावा की पर्वत श्रेणियों से सुरक्षित एवं महानदी, शिवनाथ, खारून, जोंक, हसदो आदि कई छोटी बड़ी नदियों से सिंचित छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। इन नदियों के तट और घाटियों में न जाने कितनी सभ्यताओं का उदय, विकास और अस्त कालगति के अनुसार होता रहा, जिनके अवशेष अभी भी अनेक स्थानों पर बिखरे हुए हैं और उनके प्राचीन महत्व और गौरव की महिमा का गुणगान करते नहीं अघाते हैं। ऐसा ही एक प्राचीन स्थल दुर्ग के पास है- देव बलोदा। प्राचीनकाल में देव मंदिरों के लिए प्रसाद शब्द का प्रयोग किया जाता था। प्रसाद का अर्थ होता है वह स्थल जहां मन प्रसन्न हो। जिनकी रमणीयता से देवताओं और मनुष्यों के मन प्रसन्न होते हैं- वे प्रसाद है। इसीलिए प्रसाद या देवमंदिरों के निर्माण के लिए सुरम्य स्थलों का चुनाव किया जाता था। वराहमिहिर लिखते हैं कि वन, नदी, तालाब, पर्वत, झरनों के निकट की भूमि और उद्यान मुक्त नगरों में देवता सदा निवास करते हैं, इसलिए प्राचीनकाल में देव मंदिरों का निर्माण रम्य स्थानों पर कराया जाता था। छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिर भी प्राय: ऐसे ही विशिष्ट स्थानों में स्थित हैं।




देवबलोदा या देवबलोदा चरोदा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 25 किमी की दूरी पर पड़ता है। भिलाई रेलवे स्टेशन से लगभग 2 मील की दूरी है। यहाँ भगवान शिव का 6-मासी शिव मंदिर नामक एक बहुत ही प्राचीन मंदिर है, जो 7 वीं शताब्दी का माना जाता है। यह एक बहुत ही सुंदर मंदिर है और इसके निकट एक तालाब है। मिथक है कि यह तालाब छत्तीसगढ़ राज्य के एक अन्य पुराने शहर आरंग से एक भूमिगत सुरंग से जुड़ा हुआ है। घनी बस्ती के बीच ग्यारहवीं, बारहवीं शती का शिव मंदिर दिखाई देता है। यह मंदिर प्राचीन संस्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958 के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है। इस मंदिर को भोरमदेव, खजुराहो तथा अजंता की गुफाओं से तुलना की जा सकती है।

इस मंदिर का निर्माण एक मूर्तिकार ने 6 महीने की रात्रि में नग्नावस्था में किया

कहते है कि इस मंदिर का निर्माण सिर्फ 6 महीने में हुआ था इसीलिए इसे 6 मासी शिव मंदिर भी कहते है। देखने में यह मंदिर कुछ अधूरा सा है। राजा विक्रमादित्य ने इस मंदिर का 7वी शताब्दी में निर्माण कराया था। कुछ इसे 11वी शताब्दी का मानते है। जबकि इस मंदिर में चालुक्य स्थापत्य कला का प्रभाव दिखता है। बलुआ पत्थर से बने इस मंदिर की खासियत है की इस मंदिर का शिखर ही नहीं है। मंदिर परिसर में एक बावड़ीनुमा कुंड भी बना हुआ है जिसकी गहराई आज तक पता नहीं चल पाया। कलचुरी काल में बना देवबलोदा चरोदा का शिव मंदिर 12वी से 13वीं सदी का माना जाता है।

इस मंदिर का निर्माण एक मूर्तिकार ने 6 महीने की रात्रि में नग्नावस्था में किया। उसकी पत्नी रात्रि में उसके लिए खाना लेकर आती थी। एक बार उसकी बहन खाना लेकर आ गयी उसे देखकर मूर्तिकार ने नग्नावस्था में ही कुंड में छलांग लगा दी और वह सुरंग के रास्ते आरंग चला गया। इधर उसकी बहन को लगा कि उसकी वजह से उसका भाई मर गया तो उसने कुछ दूर स्थित करसा नमक तालाब में कूदकर अपनी जान दे दी। जहाँ आज भी उसकी मूर्ति है। आरंग में मूर्तिकार सुरंग से होते हुए जिस जगह वहां पर भानदेव नामक मंदिर बना हुआ है। जहाँ पर उसकी नग्न मूर्ति आज भी देखी जा सकती है।




मंदिर के प्रवेश द्वार पर नंदी का एक मूर्ति है। मंदिर के गर्भगृह में स्यंभू भूरे रंग का शिवलिंग है। भगवान शिव, भगवान गणेश के मंदिर के अंदर अन्य देवताओं के साथ कई मूर्तियां हैं मंदिर के बाहर की दीवारों में योद्धाओं की खूबसूरत मूर्तियां, पुरुषों और महिलाओं के नृत्य, जानवरों, देवता आदि शामिल हैं। खजुराहो मंदिरो की तरह इस शिव मंदिर में भी देवी देवताओ की कामान्तर रूप और नक्काशीदार प्रतिमाये आकर्षण का केंद्र है। देवबलोदा चरोदा की इस मंदिर की बनावट ही विशेष है। पुरातात्विक महत्त्व का होने की वजह से यह मंदिर भारतीय पुरातात्विक विभाग की संरक्षण में है। मंदिर के बगल में एक कुंड है जिसका पानी कभी नहीं सूखता है। बावड़ीनुमा कुंड में सीढ़ियां भी बनी हुयी है।

वीडियो देखे 

यहां महाशिवरात्रि में प्रतिवर्ष एक बड़ा मेला भरता है। मेले के समय बाजार चौक में बहुत रौनक रहती है। मेला लगने पर आसपास के गांवों के लोग भी आते हैं। यह शिव मंदिर चारों तरफ से लोहे के जंगलों से घिरा है। एक लोहे के द्वार से मंदिर के प्रांगण में प्रवेश किया जा सकता है। मंदिर के चारों तरफ हरे-भरे पेड़ लगे हैं और चारों तरफ बैठने के लिए लोहे की कुर्सियां बनी हैं। ग्रामवासी इस मंदिर में पूजा अर्चना के लिए आते हैं। मंदिर के द्वार सुबह 6 बजे खोल दिए जाते हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि शाम सात बजे मंदिर में द्वार बंद कर दिए जाते हैं।

मंदिर एक ऊंची जगती पर निर्मित है। मंदिर के मंडप में प्रवेश करने के लिए सात सोपानों की व्यवस्था है। मंडप खुले रूप में है। वितान स्तंभ के सहारे हैं। इसके बाद अंतराल है और अंतराल के बाद गर्भगृह है। गर्भगृह के बाहर दोनों तरफ दो आले हैं जिसमें अलग-अलग रूप में गणेश जी विराजमान हैं। गांव वाले उनकी पूजा करते हैं। स्तंभों में भी विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। छत की तरफ देखने पर किसी देवता की आकृति उत्कीर्ण दिखाई देती है। गर्भ गृह के सामने छोटा-सा लोहे के द्वार है। गर्भ गृह के चारों तरफ सुंदर अलंकरण दिखाई देता है। द्वार के ऊपर गणेश जी की मूर्ति स्थापित है और उसके ऊपर सरस्वती जी की। ऊपर की ओर सात विभिन्न देवी मूर्तियां उत्कीर्ण हैं।

गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए 5 सोपान नीचे उतर कर पहुंचा जा सकता है। बीचोंबीच शिवलिंग प्रतिष्ठित है, पास ही त्रिशूल गड़ा है। शिवलिंग के ऊपर दो नाग फन हैं, जो अलग-अलग नागों के हैं। गर्भगृह में आले में पार्वती स्थापित है। आले के ऊपर लगे पत्थर पर साईं बाबा, पार्वती, शीतला माता, बजरंग बली स्थापित है। कोने में त्रिशूल रखा है। ग्राम के बच्चों के साथ मैं भी गर्भगृह में उतरी।

गर्भगृह के द्वार के दायीं तथा बायीं तरफ शिव की मूर्ति उत्कीर्ण है। शिव की मूर्ति चतुर्भुजी है। एक हाथ में डमरू, एक हाथ में त्रिशूल, एक हाथ वरद मुदा में तथा एक हाथ में आयुध लिए खड़े हैं। सिर पर जटाजूट है। कानों में कुंडल, गले में हार है। पास में नंदी और नाग का अंकन है। दोनों ही तरफ दो-दो स्त्री मूर्तियां हैं। बाह्य विन्यास में अधिष्ठान में मोल्डिंग है जिसमें गजधर, अश्वधर, फिर नरधर है। मंदिर की बाह्य दीवारों पर एक के ऊपर एक पांच पंक्तियों में अनेक तरह के दृश्य उत्कीर्ण है। दीवार की सबसे नीचे की पंक्ति हाथियों के अंकन से भरी है। इनमें कहीं-कहीं दो हाथी एक दूसरे की तरफ सूंड किए हैं तो किसी दृश्य में एक के पीछे एक हाथी है तो किसी अन्य दृश्य में हाथी एक दूसरे की तरफ पीठ किए हैं।




एक स्थान पर रीछ का आखेट करते हुए दिखाया गया है जो बहुत ही आकर्षक है। दीवारों में कई दृश्यों में रीछ का रूप उत्कीर्ण किया गया है जिन्हें मारने के लए शिकारी हाथों में बरछा लिए हुए हैं। वहां के ग्रामीणों से पूछने पर पता चला कि इस क्षेत्र में प्राचीनकाल में रीछ बहुतायात से थे। दीवारों पर अनेक मिथुन मूर्तियां भी दर्शायी गई हैं। घुड़सवारों की विभिन्न दृश्यावलियां हैं। एक दृश्य में दो बैलों को लड़ते हुए दिखाया गया है। किसी-किसी दृश्य में शिव को त्रिशूल और उमरू लिए हुए दिखाया गया है। एक दृश्य में गणेश नृत्य मुद्रा में हैं। एक चित्र में रथ पर सवार हाथ में धनुष-बाण लिए योध्दा का है। शिव अनेक स्थलों पर डमरू, त्रिशूल, कमंडलू लिए अंकित है। एक दृश्य में मूर्ति में शरीर मानव का और मुख पशु का है। मंदिर के प्रवेश द्वार के सोपान के दोनों तरफ एक ही तरह के दृश्य दिखाई देते हैं। दोनों तरफ द्वारपाल का अंकन है। एक दृश्य में सोपान के दोनों तरफ पालकी कंधे पर उठाए दो व्यक्ति हैं। एक दृश्य में पालकी में बैठा व्यक्ति स्पष्ट दिखाई दे रहा है परंतु दूसरे दृश्य में पालकी में बैठे व्यक्ति का अस्पष्ट अंकन है। पीछे कोई खड़ा है। हर तरफ की दीवार में दो-दो आले हैं जो रिक्त हैं। तीन व्यक्तियों की दृश्यावली रोचक है मध्य में स्त्री खड़ी है, उसके दूसरी तरफ नृत्य करते हुए और एक तरफ डमरू बजाते हुए नृत्य-गान का दृश्य है। उसके पास वाले दृश्य में पांच व्यक्ति विविध प्रकार के आयुधों को लिए हुए दिखाए गए हैं। इनमें एक का मुख अस्पष्ट है एक का सिर नहीं है। एक मूर्ति पशु पर सवार अष्ट भुजी है। ज्यादातर दृश्य नृत्य-गान तथा आखेट के हैं। मंदिर के भीतर चार स्तंभों पर उत्कीर्ण मूर्तियां तथा प्रवेश द्वार के चौखट पर शिल्प का श्रेष्ठ काम किया गया है और उन पर की गई पॉलिश भी उत्कृष्ट है।

मंदिर के समीप ही पत्थरों से बांधा गया एक तालाब है। मंदिर से सात सोपान उतरने पर तालाब तक पहुंचा जा सकता है। कुंड में असंख्य मछलियां विचरण करती दिखाई दे रही थी। तालाब के आसपास हरे भरे पेड़ लगाए गए हैं। मंदिर के प्रांगण में खेल रहे बच्चों और पूजा करने आए ग्रामीणों से जब तालाब के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि जब कभी तालाब का पानी कम होता है तो नीचे उतरने के लिए सीढ़िया दिखाई देती हैं। सीढ़ियों की संख्या लगभग बाईस है और तालाब में सुरंग जैसा एक छेद है जो आरंग तक जाता है ऐसा लोक-विश्वास है। वहां के लोगों को उनके अनुसार तालाब में पानी भी वहीं से आता है।

मंदिर के सामने बने खुले मंडप में चार स्तंभ है और बीच में नंदी स्थापित है। सामने पुरुष मूर्ति है। पास में ही एक छोटे स्तंभ में सती मूर्ति हाथ जोड़े खड़ी है, पास ही त्रिशूल गड़ा है।सामने एक शीतला माता का मंदिर है। उस मंदिर में पाषाण की अनेक भगवानों की मूर्तियां रखी हुई हैं। शीतला माता के मंदिर के पास एक क्वार्टर बना है, जहां चौकीदार रहता है। मंदिर के आसपास बड़े-बड़े पेड़ लगे होने के कारण और तालाब के पानी के कारण हरियाली और शीतलता मन को मोह लेती है। मंदिर के बाहरी दीवार पर उकेरे दृश्यों में मन मानो कहीं खो जाता है।

6-मासी शिव मंदिर कैसे पहुंचे

सड़क से: यह शहर सड़क मार्ग से नेशनल हाईवे द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। यहाँ पहुंचने के लिए  सभी तरह के परिवहन के साधन उपलब्ध है। देव बलोदा रायपुर से लगभग 25 किमी की दूरी पर पड़ता है। भिलाई रेलवे स्टेशन से लगभग 2 मील की दूरी है। रायपुर से कुम्हारी, चरौदा जाते समय चरौदा के पहिले बायीं तरफ इंडियन ऑयल पेट्रोल पंप से थोड़ा-सा आगे जाने पर एक रास्ता देव बलोदा तक हमें पहुंचाता है। थोड़ी दूर तक पक्का सड़क मार्ग है फिर आगे जाने पर ऊबड़खाबड़ कच्चा रास्ता है। सी केबिन रेलवे ट्रैक को पार करते हुए फिर एक और रेलवे ट्रैक को पार करने पर बस्ती दिखाई देती है, वही देव बलोदा है।

ट्रेन से: मंदिर से कुछ दूर ही देवबलोदा चरोदा रेलवे स्थित है।

फ्लाइट से: निकटतम एयरपोर्ट स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रायपुर है।

आपको ये लेख कैसा लगा, क्या आप इस जगह के बारे में और कुछ जानते है। कृपया हमें कमेंट कर बताये।



Leave a Reply